गुरुवार, 9 जनवरी 2014

.... ताल्लुक तोड़ देते है जो हमसे तो हम भी
रिश्ता मुक्म्मल तोड़ देते है, याद करते है जिनको हम
यकीं मानो ... उनके एक इशारे भर पर सांस लेना छोड़ देते है

दुनिया भर के नज़ारे है , बस
इक तेरी दीद ही रही दूर हमसे

चमन में अब के कैसा ये आलम-ए-बहारा या रब ...
न गुल खिले, न उनसे मिले , न मय ही पी या रब  

हम ग़ज़ल , हम राह , हम सफ़र एक तुम या रब
है यकीं हमें भी इतना तो ... कभी तो तुम आओगे या रब


माना के सियासत और मुहब्बत में सब कुछ जायज है
मगर ... दिल ये मेरा या के तेरा दिल है पत्थर तो नहीं

ये किसने याद किया इतनी शिद्दत से मुझको
या रब के हिचकियाँ सिसकियों में ढाल रही है

वो जो थे दर्द के गीत अब गज़ल में ढाल गए
देख तेरे आने का असर है मेरे रुखसार पे जालिम

मरने से पहले मर कर देख लेना चाहिए ...
किसी कि मुहब्बत में जी कर देख लेना चाहिए

कफ़न मुझे भी है  नसीब ... पता है मुझे
फिर भी बेवफाई तो न होगी मुझसे पता है मुझे
जिये जायेंगे इक आस है नसीब  पता है मुझे
फिर भी छोड़ दू दामन कैसे तेरा .....
तू गुजरा वक़्त तो नहीं पता है मुझे

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