भाव भटक जाएं तो क्या
कविता फिर भी लिखी जाती है
अरमान पिघल जाए तो क्या
छंद फिर भी बन ही जाते है
यू न बांधो बंदिशों में उसे
नीले आसमानों से उतरती है वो तब
जब उतरते है ख्वाबो के फरिश्ते
और सपनों की परियां ....
तब पंखों से झरती है उन परियों के
वो प्यारी सुंदर सलोनी कविता
बेशक फरिश्ते कब ठहरते है
दिल की जमीं पर हमेशा हमेशा
परियां भी तो डरती है मायावी मन से
और चली जाती है वापस भोर से पहले
मगर !
उनके चले जाने से क्या होता है कविता
तो इसी जमीं पर तन्हा भटकती रहती है
किसी किताब के पन्नो पर या फिर
कागज की कतरनों पर ...... 