बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

हकीकत सोशल मीडिया की खामख्याली की “दि सोशल डिलेमा” – डॉ अनिता राठी

 हकीकत सोशल मीडिया की खामख्याली की “दि सोशल डिलेमा” – डॉ अनिता राठी

 

इंसान के जज्बातों से पहले कुछ मनचले और कुत्सित मानसिकता के लोग ही खेला करते थे | मानव प्रक्रति से ही भावुक और  जज्बाती होता है, भावनाओ और हसीन सपनों के सलोने संसार में अनोखेपन को खोजता रहता है | सोशल मीडिया के सच को बखूबी उजागर करती है “दि सोशल डिलेमा” एक फिल्म जो किसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म सी लगती है मगर इंसान की आँखे खोल देती है | और साथ ही देती  है एक ऐसा शॉक जिसे सोचकर हम खुद को बुद्धिमान समझदार होने का भ्रम त्याग से देने को विवश हो जाते है और खुद को लुटा सा ठगा सा महसूस करते है |एक ऐसी दस्तावेजी फिल्म जिसके निर्देशक है जेफ़ ओर्लोव्सकी जिन्होंने हमें सोशल मीडिया के छुपे हुए सच को उजागर कर बताया है समझाया है | ये डेढ़ घंटे का एक ऐसा नरेटीव फिल्म के रूप प्रस्तुत किया गया है जिसमे फेसबुक हो या व्हाट्सअप , यू-ट्यूब , ट्विटर, इन्स्ताग्राम में काम करने वाले महारथियों ने खुद सामने आकर एक अल्गोरिइ दम के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझाया है की कैसे वे सोशल मीडिया के माध्यम से आपकी मानसिकता को पढ़ लेते है और इस काम में वे दुनिया के महंगे से महंगे सैकोलोजिस्ट्स की मदद लेते है | फिल्म की तकनीक एकल व्यक्ति – संग – कैमरा साक्षात्कार प्रणाली पर आधारित है यानि सभी महारथी एक काल्पनिक एकल परिवार का सा हिस्सा भी लगते है लेकिन है सब अपने अपने फील्ड के असल महारथी जो एक एक कर एक स्टेज पर आते है और अपने अपने किरदार का प्रस्तुतिकरण खुद देते है की वो कैसे एक एक व्यक्ति की सोशल मीडिया- पहचान यानि आई डी की मानसिकता उत्सुकता को पढ़कर उसे सोशल मीडिया के अधिक से अधिक उपयोग का आदि बनाने की भरपूर कोशिश करते है कैसे वो व्यक्ति के सोशल मीडिया यूज का समय बढवाने में सफलता हासिल कर ले रहे है | और इस सब को एक काल्पनिक परिवार के बिखर जाने में सोशल मीडिया कैसे अंजाम देने में सफल साबित हो जाता है की कहानी को भी बीच में रखा गया है |

90 के दशक तक फ़िल्मी गानों से भावनात्मक लागाव उसके रहन सहन , व्यवहार, तौर तरीको, बोलचाल में साफ़ प्रतिबिम्बित हो जाता था| उसके बाद टेलीविजन और उसके किरदारों का प्रभाव समाज में साफ नजर आने लगा | टेलीविजन पर व्यक्ति के जज्बातों और भावनाओं से जोड़कर प्रत्येक प्रकार की वस्तु के विज्ञापनो की बाढ़ सी आ गयी और इंसान के दैनिक जीवन में वे वस्तुए आम तौर पर शामिल होने लगी जिनका अस्तित्व बाज़ार में तो था मगर लोगो तक पहोंच बहोत कम होने के कारण जिसे जिस वस्तु की अति आवश्यकता होती वो ही व्यक्ति बाजार जाकर उसकी जानकारी लेता और खरीदता | व्यापारी लोग चतुर होते है अपनी वस्तु कैसे किसी गैरजरुरतमंद को भी बेच कर अपना व्यापार करना है ये उसका हुनर होता है, किन्तु भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां आज  भी 65% आबादी गाँवों में रहती है वहां फैशन, मनोरंजन और घर की आन्तरिक बाहरी साज-सज्जा, लेन देंन दैनिक व्यवहार में अपनि आय के अनुरूप ही खर्च किया जाता रहा है| आय-व्यय का एक संतुलित तालमेल बनाकर चला जाता है| किन्तु आज इन्टरनेट वाई फाई, मोबाइल, सोशल मीडिया का ज़माना है और प्रत्येक व्यक्ति के पास लैपटॉप , मोबाइल , कम्प्यूटर है , हजारो तरह  की इन्टरनेट एप्प , वेबसाइट है ऐसे में व्यापार का तरीका भी बदल गया और व्यापार का अहम हिस्सा उत्पाद की मार्केटिंग का तरीका भी बदल गया है | जिस प्रकार सोशल मीडिया जब अस्तित्व में आया तब हम सब इसे खेल खेल में काम लेते थे फेसबुक हो या व्हाट्सअप , यू-ट्यूब , ट्विटर, इन्स्ताग्राम इनकी सबसे बड़ी  खूबी ये की ये हमे ये जताते है की ये सब सुबिधाये हम मुफ्त में काम ले सकते है और हमारी इसी मानसिकता को सोशल मीडिया के टॉप संचालको या कहें इनके जन्मदाताओ की तीक्ष्ण बुद्धि ने खूब भांपा और पूरी दुनिया के लोगो को बाजार आधारित व्यवस्था के पुराने सबब में बदल दिया | कहते है ना की अगर आपसे किसी वस्तु या सेवा का पैसा नही लिया जा रहा है तो मान के चलिए की आप उपभोक्ता ना होकर खुद उस वस्तु में बदल चुके है जिसे बेचा जा रहा है | इसी सबक को आज फेसबुक हो या व्हाट्सअप , यू-ट्यूब , ट्विटर, इन्स्ताग्राम जैसी सोशल मीडिया सेवाओ के संदर्भो में देखेको  तो हमारा खुद को इन सेवाओ का उपभोक्ता समझना दरअसल किसी खामख्याली से ज्यादा कुछ नही होगा | इन सब सोशल मीडिया साइट्स पर हम जो समय व्यतीत करते है ये ही हमें वो वस्तु बना देता है जो उपभोक्ता ना रह जा कर इनके मालिको की वस्तु बन जाती है | ये लेख एक चेतावनी है खासकर हम भारतवासियों के लिए, कैसे ..... ? इसके लिए एक बार जरूर देखियेगा ये फिल्म  “दि सोशल डिलेमा”  । 


डॉ अनिता राठी, 

जयपुर- राजस्थान

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

कविता फिर भी लिखी जाती है

 भाव भटक जाएं तो क्या 

कविता फिर भी लिखी जाती है 
अरमान पिघल जाए तो क्या 
छंद फिर भी बन ही जाते है
यू न बांधो बंदिशों में उसे 
नीले आसमानों से उतरती है वो तब 
जब उतरते है ख्वाबो के फरिश्ते 
और सपनों की परियां  ....
 तब पंखों से झरती है उन परियों के
वो प्यारी सुंदर सलोनी कविता 
बेशक फरिश्ते कब ठहरते है 
दिल की जमीं पर हमेशा हमेशा
परियां भी तो डरती है मायावी मन से
और चली जाती है वापस भोर से पहले
मगर !
उनके चले जाने से क्या होता है कविता 
तो इसी जमीं पर तन्हा भटकती रहती है
किसी किताब के पन्नो पर या फिर
कागज की कतरनों पर ...... 💐

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

दोस्त

दोस्त

ना अब वैसे से रहे
जो कहे बाद में पढ़ लेना
आजा खेले

दोस्त

ना अब वैसे से रहे
जो ले जाये बेफिक्री
की पटरियों पर

दोस्त

ना अब वैसे से रहे
जो ढूंढ लाते थे मुझे
कॉलोनी के किसी भी कोने से

दोस्त

ना अब वैसे से रहे
जो डरा दे आसमान से
कह कर ये की
अपन कुए में पड़े है बहुत गहरे

दोस्त

अब ना वैसे से रहे
जो देख कर दरवाजे पर मुझे
पेट भर जाने का हवाला दे
उठकर आ जाते आधे भूखे पेट

दोस्त

अब ना वैसे रहे
जो आते तो फिर जाने
का नाम न लेते जब तक
घर वाले ना लेने आ जाते

दोस्त

अब दोस्त से ही ना रहे

बुधवार, 8 जुलाई 2020

महक

महक उसकी
मेरे शाने से
अब जाती नही
नींद भी उन्नीन्दी सी
कभी वक्त पर अब
आती जाती नही

High fly

There is a light
flying high flight
aborigin of none
origin of all aright

Migling some sound
Globe Round Around
Whispering winds
 To'night Aloud oh Aloud

Gazing me those Two Eyes
Sweet Shine Spakling Eyes

Love lorned I
oh my dear
Returned so late
but abide

Late too i know
its Deep Night
Ok Come n
Hold me so tight
Let'S allow our
 feelings together
Aah! alas
go on a endless flight.💐

@DrAnitaRathi/5/March/2020
@CopyRight 'सभ्यता के तहखानों से'
#ScholarZypsy

उन्नीन्दी नींदे

महक उसकी
मेरे शाने से
अब जाती नही
नींद भी उन्नीन्दी सी
कभी वक्त पर अब
आती जाती नही

प्रीत

शब्दो के आंगन में
प्रीत रजनीगंधा सी
बहक बहक कुछ यूं
बहक
की महक महक कर
महक महक

यादो के पतझर में ...
मासूम पत्तो का बिछड़ना
नीम तले की छाँव में
मगर उदास है मन

कच्चे सूत के धागे में पिरो रखे ह
कुछ अरमान
और टांग दिए सामने दीवार पर
 एक कील की नोक पर

उसके घर के मेहमानखाने से
ले आयी थी आँचलभर 'अहसास
अब रखे है सिरहाने मेरे

बड़े इत्मीनान से वो मुझको
भुला रहा है  ये याद दिला देती हूं
 उसे मैं कभी-कभार



कुहासे

... और जब पगडण्डी पर
 कदम दर कदम
छाप पड़ जाती है,
उसी क्षण अहसास हो जाता है,
कि सफर कितना कट गया
 कितना बाकी है
--- कुछ नही अहसासो में सांस अगर
बाकी नही है अहसास में साँसों की ताल
एक लय में हो तो ही कुछ है
अन्यथा व्यर्थ है
--- धरती का धड़कना भी और
धधकना भी , रुत आयी थी
मगर रुत कब रुकती है चली गयी
अब रिक्तता से पहले की
शोरबाजी है अब रिक्त होओगे
होना ही है होना होगा नियति है
पड़ाव आते है लगता है अब बस
साँसे ना जड़ो की मोहताज है
ना तने की ना शाखों की ना
उन पर लगी कोंपलों की
--- हाँ साँसों को अहसास चाहिए
होने का और ना होने का
दूर क्षितिज तक ब्रह्मांड में
जहाँ तक निगाहों की हद तक
फिर कुहासा नही सुवास सा होगा
और साथ होगा होने का अहसास
@AnitaRathi #राहीराज

शब्दों के सेतु

शब्दों के सेतु बना कर
वो कभी तुम्हे लक्ष्मी तो
कभी सीता कहेगा
तुम समझ मत लेना
ये भूल मत कर लेना
फिर उसी सेतु पर चल कर
इक दिन वो तुम्हे कुलटा तो
दूजे दिन  कुलक्षणी कहेगा
तुम समझ न लेना
ये भूल मत कर लेना
शब्दों के सेतु पर चल कर
वो तुम्हे कभी राधा तो
कभी तुम्हे सोहनी कहेगा
तुम समझ न लेना
ये भूल मत कर लेना
फिर इसी सेतु पर चल कर
इक दिन वो तुम्हे कलंकिनी कहेगा
कच्चे घड़े से चिनाब उतारेगा
तुम मान न लेना
ये भूल मत कर लेना
मेरी प्रिय
ये शब्दों के सेतु है
वैतरणी नहीं तारेंगे
ये शब्दों के सेतु है
माँ का गर्भ नहीं जो
तेरी नियति लिख देंगे
ये शब्दों के सेतु जो है
एक एक शब्द मतलब से है
शब्दों का ये सेतू मतलबी है
तू अपनी खुदी में रह
तू अपनी जमी पे रह
तू अपने आसमां में उड़
तू अपने समन्द्र में तैर
तू खुद खुदी की नदी हो जी
शब्दों के  सेतु को तू ढ़हा
मतलबी शब्दों के सेतु को
तू ले जा बहा
समझ मेरी प्रिय तू
खुद की मौज को समझ
तू ये भूल न जाना
शब्दों के सेतु बनेंगे
तू उनको बहा ले जाना
भूल न जाना ।
rAnita Rathi

लाशों के बाजार



राजनीति तेरे कद्रदानों के लिए
लाशो का इक बाजार होना चाहिए

मुर्दो की वैरायटी होनी चाहिए
देश के कोने कोने ये व्योपार होना चाहिए

कभी मुर्दो का export तो कभी
 इम्पोर्ट  भी होना चाहिए

राजनीति की सजावट के लिए
लाशो का शोरूम होना चाहिए

चमाचम लाईटो के बीच
सडी गली रेप की हुई लाशें होनी चाहिए

मीडिया की सुर्ख़ियो में हर लाश का
 राजनितिक पंचनामा होना चाहि

लाशे कम पड जाये तो ओ राजनीति
महामारियों के  विकल्प होने चाहिए

लाश न सही मिक्स मैच फ्यूजनिस्टिक हड्डिया ही हो
 पर कुछ तो निर्जीव होना चाहिए ,,

राजनिति के खेल में सदी के महानुभावों
के वास्ते लाशो का हिस्सा होना चाहिए

ताली थाली शंख बजते रहै लग गए ढेर
हो पुष्पवर्षा अब तो, ब्रह्मनाद भी होना चाहिए।

copyright डॉ. अनीता राठी 'राहिराज

सपनीली लड़की

ख्वाबों  की एक बस्ति थी .
. एक  लडकी  उस  मे  रहती  थी ..
. अपने घर  के  आंगन में.
कुछ  सपने बोया  करती  थी .
अपने  कमरे   कि खिडकी मे
 बूंदो  से  खेला   करती  थी ..
. सब  के  सामने  हस्ती  थी बहोत
  और ... छूप छूप   कर  रोया  करति  थी
 चांद को  कई  देर  तक ..
अक्सर देखा करती थी बहोत
 खुद  से  ही बाते करती  थी ..
. देखने  वाली   सब  आँखों में ..
..  कागज कि गुडिया सी थी
...ज़ब  टूटे ख्वाबो कि किरचो सी बिखरी
तब जाना ज़माना वो
 कुछ और ही शय  थी ...

.with special memories... of .. togetherness..copyright  डॉ. अनीता राठी

खार

दर्द की एक अनवरत दास्तान छिड़ गई
जिंदगी बनके खार समंदर रह गई

उनको क्या कहे जो बाग़बाँ है मुल्क के
अब तो शाखों पर सूखती कलियाँ रह गई

जश्न जिंदगी के हवा हो रहे मद्धम मद्धम
जिंदगी अब दर्द के शूलों में लहूलुहान रह गई ।

@कॉपीराइट डॉ अनीता राठी

पाणिग्रहण

लो महका चन्दन
महकी हिना या रब
दो हतेलीयो का
 जब हुआ 'पाणिग्रहण'|

अब क्या खोना क्या पाना
रूही गुलाब चम्पा महके है
 मोगरा मदिर मदिर
तेरे शाने से जा लगा जब
मेरा इक सपन सलोना |

लो फलक पर फिर आज
 यादों का कारवां है
दिल के आसमा पर
रौशन इक आफताब सा है |

 Dr-Anita Rathi

किरचें

है एक आफत
इस तरफ
और
एक गफलत
उस तरफ
आज दोनो के
दरमियाँ
इतना खिंचाव
क्यों है

है मुश्किले भी
 कुछ अजब
क्यों हम बारिशों
में भीग से जाते  है
जब जब कुछ
ख्वाब किरच किरच
हो बिखर से जाते है।

रंग हिना हो
महकता मोगरा हो
संदली खुशबुओं
का साथ हो
जो तुम आओ

मस्त हवा सी

ना टूटी है
ना बिखरी है
वो मस्त हवा
के झोखे सी
जो बहती है
न रुकी है कहि
न झुकि है कभी
वो चटटान सी 'अडिग
तटस्थ ही रही है
17/62019
'राहिराज'
बड़े बेरुखे , बड़े बेअदबी होते है
ये दो कौड़ी के लोग
जीवन भर दुख देते रहते है
 ये दो कौड़ी के लोग
चमड़ी जाए तो जाए मगर
 दमड़ी एक नही जाने देते
 ये दो कौड़ी के लोग
देखकर दूसरे की मुस्कुराहट
न जाने क्यों जल जल कर
काठ हुए जाते है
ये दो कौड़ी के लोग
एक मक्खी गर गिर जाए चाय में
तो चूस कर उसको चाय पीने वाले
कैसे जीव होते ह या रब
ये दो कौड़ी के लोग
औकात नही इनकी
हमसे नजर मिलाने तक कि
फिर भी देखो हम पर ही
उंगली उठाने की हिमाकत तक
कर लेते है
ये दो कौड़ी के लोग
धोखा फरेब छल कपट दौड़ रहा
लहू की जगह इनकी रग-रग में
जब तब तेजाबी डकार मारने वाले
बड़े ही मतलब परस्त होते हैं ये
दो कौड़ी के लोग
कौन जाता है मिलने इनसे घर पर इनके
वक्त बेवक़्त बिन बुलाए खुद आ धमकते
बेगैरत बदनाम
ये दो कौड़ी के लोग
इज्जत जिनकी गिरवी रखी है
मयखानों और पुलिस थानों में
अक्कल नही जरा भी
इनके अक्कलदानो में
जाने कैसे जी रहे  है
ये दो कौड़ी के लोग
ये कभी नही हो सकते शामिल
हमारे कद्रदानों में न जाने कैसे
इंसानों की बस्ती में आ बस्ते है
जबरदस्ती से, निर्लज्ज बहुतेरे ये
दो कौड़ी के लोग ।

@CopyRight,सभ्यता के तहखानों से
डॉ. अनीता राठी

नीम के पेड़




'नीम के पेड़'

नीम का वो पेड़
चौक के बीचोबीच
वो मोटी रस्सी का
बड़ा सा झूला
वो सावन की बारिश
तीज का लहरिया
मम्मी की सहेलियां
मौसी और मामीयां
बहन-बाई  और बुहाजियाँ
एक भी uncle नही थे
ना ही थी कोई आंटियाँ
सब चाचाजी और मामाजी थे
सड़क किनारे बड़े बड़े नीम
नीम तले ताश खेलते दादजी थे
तब राष्ट्रीय राजमार्ग नही थे
सड़क भी अपनी बपौती थी
जब मैँ बहोत छोटी बच्ची थी
कच्चे घर थे मगर सच्चे रिश्ते थे
खुशी पास होने में होती थी
परसेंटेज के कोई मायने ना थे
मेरिट नही थी किसी धेले की
घमण्ड के घुटने तोड़े जाते थे
मुस्कुराहटें रोते चेहरों पर
जब तलक ना ले देते थे
आधे मुहल्ले के लोगो के
गले मे न निवाले उतरते थे
लाइट चली जाए तो
मुहल्ले में उत्सव हो जाता था
लु और गर्मी के थपेड़ों का भी
अपना ही मजा होता था

@डॉ अनिता राठी 'राहिराज -

' दोस्ती 




दोस्ती के नाम कुछ जाम छलकने चाहिए ...
दिलो की दुनिया है दोस्त ना मायूस दिखने चाहिए

दिलबरों सुनो दिलबर की बात जरा गौर से
करीब रहो दिल की दुनिया आबाद रहनी चाहिए

मांगी दुआए, सजदे किये कलमें पढ़े अब जिद है यारा
तुम्हारे दिलो पे मेरी भी सल्तनत होनी चाहिये ।।

बुधवार, 29 जनवरी 2020



अपने पास एक खंजर धारदार रखिये
छुपे बैठे रंगे सियार नज़र पहरेदार रखिये |

करने वार तुम्हारी हस्ती पर चालाक रिश्ते
सम्हाल सम्हाल कर आगे कदम रखिये |

आस्तीन के सांप है कुछ दोस्त यहाँ 'राहीराज'
थोडा जेहर गटकने की आदत बनाये रखिये |

झूठे वादों से मतलब साधने वाले ये कमीने
नगीने परख परख पालने का हुनर रखिये |

इतनी आसान नहीं डगर पनघट की यूँ
सम्हल सम्हल कर कदम काई पर रखिये |

एक से एक है कलाकार इस जहां में
आप अपनी अदा का पूरा पूरा ख़याल रखिये|

विश्वासघात करेगा वो ये ही फितरत है उसकी 'अनु'
जागी रह, वो खड़ा है हर लम्हा करने वार, चौकस रहिये |

बहुत जालिम है दुश्मन के नाती
फिर भी पीठ पीछे बैठे घात लगाये देखिये |

कल घर से निकले ही नहीं तुम , वरना
वो तो साधे है तुम पर निशाना सम्हालिए।

कितने सूरज उग दो चहुँ और दोस्त
अंधेरो का किये वरण मेरे प्यारे बैठे है |
 ********