रविवार, 28 जुलाई 2013
गुरुवार, 25 जुलाई 2013
उत्तराखंड त्रासदी, शीर्षक से निराला उत्तराखंड में प्रकाशित मेरा लेख पार्ट- 2 , (16-30, July, 2013) आदरनीय मित्रो मेरे इस लेख का कोलाज/ इस लेख का चित्रांकन अपनी महानता का परिचय देते हुए उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध कलाकार श्री बी . मोहन नेगी जी ने सस्नेह भेंट दिया है, कला के पारखी की सुंदर कूंची को मेरा नमन, बहोत बहोत धन्यवाद। —
शनिवार, 20 जुलाई 2013
.नारी - मानवता की तलाश में : तुम सदा ही छली गयी (...भाग -2)
.
....खुद अपने से छली गयी
अपने अपनों से छली गई
प्यार के कच्चे धागे के नाम पर
बन्धनों में बाँध बाँध छली गई
पिता बन पुरुष ने सिखाया
तुम्हे साहसी होने का हुनर,
भाई बन पुरुष ने सिखाया
तुम्हे हिम्मत से डटे रहना
माँ बन तुमने सिखाया
रोटी गोल बना न
और इसी लिए तुम अब
आदि हो गई हो किसी न किसी
दिशा सूचक की , रेत की
घडी पर फिसलती , दरकती
इन् बैसाखियों की, .......
लडखडा जाती हो जब नहीं
रहती साथ ये बैसाखियाँ
बैसाखियाँ , बैसाखियाँ ही होती है
टूट जाती है, थक जाती है अपना
महत्व बनाये रखती है और जब टूटने
लगती है तोड़ जाती है तुम्हे और
जाती है तुम्हे हवाले पराई बैसाखियों के
तुम घायल, लडखडाती सी तुम
कर लेती हो सहर्ष स्वीकार
दीमक लगी बैसाखियाँ ...
सीली , गली भीतर तक ,
और फिर चलती हो असुरक्षित
न सम्हली तुम गिर गिर
पटखनी खा खा होती हो
फिर गिरती हो , पिटती हो
उसी बैसाखी से ...
2 . फिर पालती हो
और कई नाजायज बैसाखियाँ
ब्याहती हो किसी और की सुहाग सेज
के फूलो को, बन जाती हो ... भाभी-देवर की,
एक और बैसाखी रखती है हक अब
तुम बंद हो बैसाखियों के बांस
के जंगल में, जब एक एक कर
बांस बड़ा होता है तुम्हारे
कद से कई कई गुना रातो रात
और तुमने खो दिया खुद को
रही तुम अधूरी हर पल ले
साथ बैसाखियों का, न चुना तुमने
खुद की खुदी को , और बन रही
.."अर्ध-सत्य" ..
नारी दीर्घ शीर्षक के अंतर्गत अब तक प्रकाशित २ कविताओ के श्रृंखलातार्गत --- आज २०-७-२०१३ को लोकजंग , भोपाल से प्रकाशित कविता ...
मंगलवार, 16 जुलाई 2013
.यादें ...10
मुस्कुराती चांदनी रातो में जब ताप चढ़ने लगता है, ऐसा लगता है मानो सब कुछ पिघल कर, राख हो जाना चाहता है , तुम तो कहीं नहीं, अब सिर्फ यादें है, एक अजीब सी बैचेनी है रूहानी बाते , बड़ी रूमानी बाते लगती है , लेकिन कभी कभी सोचती ह, क्यों पसंद करते है हम वो हलकी सी गंध किसी अपने के शाने की, क्यों उसकी महक से महकने लगती है ये बगिया ... सोचते सोचते चल ही रही थी की ... अचानक सड़क की छाती पर बने बड़े से स्पीड ब्रेकर ने मेरी यादों के कारवे को और गति दे दी , ये स्पीड ब्रेकर भी अजीब होते है थोड़ी थोड़ी दूरी पर मिलते रहते है, और अपने नाम से बिलकुल जुदा , स्पीड ब्रेक करने की बजाय बढा देते है ... चलते चलते बहोत दूर निकल गए हम ... थक रहे थे तुम भी और मैं भी , तुम इस ख़याल से की हम और आगे चलते चले, तुम निश्चिन्त , मगर मैं मैं तो गुमसुम सी चल रही थी, सिहरन थी, अजीब सी , की साँसों के तार टूट ते से लगे अचानक या भी ख़याल आने लगा , खो न जाऊ कहीं , फिर लगा न पीपल के पेड़ से लिपट अमर बेली बनी रहो इसी सेतु से जी पाओगी , जानते हुए भी की .. की ... तुम्हारी रगों से सारा का सारा पारा उस हाथ की गिरफ्त में आ गया था जो थाम था तुमने इतनी जोर की ... जरा पकड़ ढीली पड़ती तो हाथ पर तुम्हारी उँगलियों के निशाँ बन गए ... रक्त रंजित हाथ , गवाह थे तुम्हारी मजबूत पकड़ के ऐसा नहीं था की मुझे यकीं नहीं था पर मैं चल रही थी नहीं तुम चला रहे थे मुझे ... एक ऐसी सड़क पर जिसके दोनों और अलग अलग सड़के और थी , हाँ ठीक वैसे ही जैसे ३ लेन सड़क बहोत मुश्किल था बीच वाली राह चुन कर चल पाना वो भी स्पीड ब्रेकर्स के साथ, बस एक बात अछि थी उस सड़क पर तुम्हारे साथ थी ... पसीने से लथपथ ... दोपहर ... हम चलते रहे, शाम का ठंडा झोखा, दिल के मौसम को और सुहाना कर जाता, फिर रात आती तो लगता, ...................................... "लो कुछ पल साथ बैठ कर गम खाते है और सुकून पीकर थोडा ठिठक लेते है ...."
दॊनो ओर सुनसान सड़क , कनाडा की सुनसान सी वो एक सड़क ... सुभा होने से पहले उस सड़क से चलते चलते याद आंये लगी ....... रोबर्ट ब्राउनिंग की एलिज़ाबेथ ... लास्ट राइड टू-गेदर .... और न जाने क्या क्या ..... फिर तुम्हारा चेहरा देखा मासूमियत भरा ... सोच नहीं सकती थी वैसा जैसा ब्रोविंग का पजेसिवे प्रेमी करता है प्रेमिका के साथ, .. फिर सिहर उठी अपने ही डर से , जो लाज़मी था इस नव-विक्टोरियन युग में ... या कहूँ ... विज्ञान के सैटलाईट युग में .. कुछ भी संभव है .... याद आगया एक जोक .... एक प्रेमिका प्रेमी को दोषी ठहराती है .. पिछले नौ महीनो से तुम मुझसे फ़ोन पर ये ... ऐसी वैसी बातें कर रहे हो ... प्रेमी ने कहा तो .... प्रेमिका तो क्या अगले महीने तक खुशखबरी सुना दूंगी ...... बड़ी शर्म आई सोच कर भी उफ़ ..... आज कल के प्रेमी -प्रेमिका, हाई - टेक लव .... वापस लौटी इस ख़याल से तो देखा तुम वैसे ही मेरा हाथ थामे चलते जा रहे थे ... क्या वाकई हम निकल चले लास्ट राइड पर .... और वो आजू बाजू वाली सड़के वो साथ चलेंगी क्योंकि हाई वे पर चलना था ..... बीच सड़क चलना चुना था ..... लास्ट राइड पर ... साथ साथ ..... बिना सवालों की रातों के .. बिना जवाबो के दिनों के ..... तुम रुकते भी तो कहाँ ... कोई दरखत नहीं था हाई वे पर .... हाँ जगह जगह तुम कभी कभार दुसरे हाथ से ... हमारी हम राही वो झर-बेरी के बेर चख लेते ....... कांटो की परवाह किये बिना ... और यही मुझे रिझा जाता ..... कमाल के गड्स है .... लॉन्ग राइड पर ... भूखे , पियासे , सिर्फ और सिर्फ झर-बेरी के खट्टे मीठे फलो के सहारे ....... गुजर कर पाओगे ....... क्या कहूँ ...... बस यादें है .... याद आती है .... बातें बातें तो जी जाती है ओर ... जी कर उस्सी सांस के साथ ख़तम हो जाती है जिस सांस के साथ कही सुनी ... यादो का क्या ? यादें तो याद आती ही है…. बातें कभी कभी भूल भी जाती है………
सोमवार, 15 जुलाई 2013
याद रखना , मैं सावन हूँ .....
ऐ ! शहजादी देखो
कितनी चीज़े लाया हु
बादलो का डेरा
बिजली की पायल
बूंदों के झूले
प्रेम-राग के गीत
याद रखना , मैं सावन हूँ बरस में
एक बार तो ज़रूर आऊंगा
फिर क्या हुआ
जो तब गया
और अब फिर आया हु
सावन हूँ बना कर अपनी
तुझको, जाते जाते भी
दामन तेरा भर जाऊंगा
याद रखना , मैं सावन हूँ बरस में
एक बार तो ज़रूर आऊंगा
ये ओर बात है
जाते जाते तोहफा
गीत विरह के दे जाऊंगा
लब गुन गुनायेंगे दिन रैन
याद रखना , मैं सावन हूँ बरस में
एक बार तो ज़रूर आऊंगा
शनिवार, 6 जुलाई 2013
सन्नाटा सा हर तरफ छाया क्यूं है ...
जाने अब केदार का नाथ गया कहाँ है
सन्नाटा सा हर तरफ छाया सा क्यू है
सन्नाटा सा हर तरफ छाया सा क्यू है
आज मनन में ये उदासियाँ क्यूं है
दुश्मन करता रहता साजिशें क्यूं है
पंछी घरोंदे से डरने लगा क्यूं है
समंदर की गहराइयों में उदासियाँ क्यूं है
सर उठाये हिमालय अपनी जड़ो से
डरा सहमा सा क्यूं है ........
गोद में मेरी बैठे केदार क्यूं है
तीसरी आँख आज फिर मूंदे क्यूं है
सोच रही भागीरथी मेरा कुसूर क्या है
आज मेरे बाल-गोपाल मुझ ही से
खफा खफा से क्यूं है
इक पागल बादल से हुई ये खता क्यूँ है
बूँद बूँद बरसता था आज गुर्राया क्यूं है
यूँ गरज गरज बरसता था उमड़-घुमड़
नाच नाच कर तांडव मचाया क्यूं है
*** को गुस्सा आज आया क्यूँ है
मंदिर बनाया अपने हे त्रिपुरारी
केदार खुद को कहलाया क्यूं है
बदला लिया कैसा हमसे
भूचाल इतना मचाया क्यूँ है
नर मुंड की माला से खुद को
एक बार फिर सजाया क्यूँ है
वृन्दावन की गलिओं का ग्वाल
गोवेर्धन चिट्टी पे उठाने वाले
हथेली पे हिमालय उठाने आया नहीं क्यूँ है
बस्तियां बसा बसा के
निर्मोही यूं उजाड़ता क्यूं है
ना खुदा मेरे किश्तियों को यु
घेर घेर बहा ले जाता क्यूँ है
तुझ को जल अर्पण करने आये
तूने उनको जल-प्रलय से बहाया क्यूँ है
बता दे हे घाट घाटो के वासी
हम जीवो के जीवट को ऐसी
बेरहमी से मुक्ति घात उतार क्यूँ है
हम तो आये तेरी लीला देखने
तूने कोहराम मचाया क्यूँ है।
तू शमशानों का वासी है तो
इस संसार को बसाया क्यूँ है
हम जीवो को जीते जी
शमशान में दफनाया क्यूँ है
फिर देख दुबारा महिषासुर सा
सैलाब आया तू चुपचाप बैठा क्यूँ है
घर बाहर मत निकलो साथियो
जाने अब केदार का नाथ गया कहाँ है
सन्नाटा सा हर तरफ छाया सा क्यू है
आज मनन में ये उदासियाँ क्यूं है
गुरुवार, 4 जुलाई 2013
Come hold my wrist-together.......
come hold my wrist
and walk together
Arise and Spread Your Arms
Fly and Reel the Fawn
Oh, Sensual Beast
Inhale Aroma so Fresh
of Rained Soil
Misty Cool Breeze
Move upward
Let Our Souls Meet
There, Where they
Wish to be forever
In Relationship so
Sweet, yea its true
My dear, Let us meet
Where the Ape and Tiger die
and meet at
ultimate to confess
the pious sins
Where .......
Love and Desires
dies and uprise
Our True Spirits .
Come n Fly with me
This Morning me n
you together we
meet together we fly
come hold my wrist
and walk together.
बुधवार, 3 जुलाई 2013
1. हमारा प्रदेश हमारी संस्कृति : राजस्थान
-
राजस्थान
म्हारो राजस्थान -
राजस्थान की माटी की सुगंध, धोरो की धरती की तपिश, चांदनी रात में खिल चाँद का नूर, उगते सूरज सा रोशन चेहरा राजस्थान का, राजस्थान के लोगो के रंग बिरंगे चटकीले खुशनुमा रंगों के कपडे, हर हाल में खुश रहने वाले साधारण दिल ओ दिमाग के धनी अपने पन से भरे हिरदय , कोई लाग लपेट नहीं , किसी का दिल नहीं दुखते मेरे राजस्थान के लोग : दुनिया के नक़्शे पर अपनी अलग पहचान बने है अपनी मेहनत से। इसका हिरदय है --- जयपुर -- गुलाबी नगरी - पहले अजमेर। पधारो म्हारे देश ... अतिथि देवो भाव के भाव से लवरेज हर एक का ह्रदय .....
यह
एक ऐसी रचना है जो राजस्थान
की सांस्कृतिक धरोहर से आपको
अवगत करवाती है साथ ही साथ
आपको वहाँ नगर प्रासादों के
सुंदर इतिहास का संक्षिप्त
वर्णन भी प्रस्तुत करती है।
यह स्तम्भ अपने आप में अनूठा
स्तम्भ है। इस कड़ी में बहोत
ही कम अध्यन हुए है,
वैसे
हर शहर की अपनी कहानी होती है
परन्तु वह अच्छे कहानीकार के
अभाव में अधूरी सी ही रह जाती
है। इस कड़ी में हम आपको राजस्थान
के राजसी ठाठ-बाट
,
गली-कूचो,
हुनरमंदो
और दस्तकारो का बखान प्रस्तुत
कर रहे है प्रस्तुत है इसी कड़ी
में एक बेजोड़ कहानी राजस्थान
की राजधानी कहे जाने वाले
गुलाबी शहर -
जयपुर
की। मेरे इस लेख से अगर
आपको जयपुर का चित्रण ,
वर्णन
साक्षात होता है तो मैं अपने
को धन्य मानूगी।
भारत का
पेरिस कहलाने वाला शहर जयपुर,
1727 ई
.
में
पौष क्रिशन 1
संवत
1784
वि
.
में
इसकी नींव रखी गई। जयपुर
शहर विश्वभर में अपनी एक अलग
पहचान रखता है। करीब अढाईसौ
बरस पहले आमेर के महाराजा सवाई
जयसिंह ने इसका सपना देखा था
और उसी के अनुसार इस शहर को
बसाया,
महाराजा
सवाई जयसिंह के नाम पर इसका
नाम जयपुर रखा गया। इस शहर
के अलग अलग मुकाम ,
चौकड़ियाँ
,
चौपडो,
बाजारों,
कत्लो
,
बाग़-
बागीचों
की छठा देखते ही बनती है।
राजमहलो,
जनानी-ड्योधियों,
के
रावल,
राजमंदिर,
कारखानों
की अपनी कहानी और महत्त्व है।
वातु कला की विधा पर निर्मित
जयपुर शहर की गलियों,
मुहल्लों,
रास्तो
के नाम मशहूर हुए उनमें रहने
वाले के हुनर,
काम
और राजशाही के ओहदों से। कुल
मिला कर गज़ब सलीके से बसाया
जयपुर शहर,
बड़े
बड़े इंजीनियरों को आज भी दांतों
तले ऊँगली दबाने को मजबूर कर
देता है स्थापत्य का बेजोड़
नमूना हवा महल विश्व के साथ
आश्चर्यों में से एक है। शहर
जयपुर,
लम्बी
चौड़ी और ऊँची प्राचीर से घिरे
इस नगर में प्रवेश करते है,
.... अरावली
की सुंदर पर्वतमाला से ...
शहर
को अपनी असीम सुंदर वरमाला
से बांधे अरावली पर्वतमाला
मानो इसका गहना हो। खेरुज चुने
से बना गुलाबी रंग से रंगे चारदीवारी
क्षेत्र के शिखारांत मंदिर
और झुके झरोखों ,
जालीदार
छज्जो वाले प्रासाद।
चारो
कोनो पूर्व,
पश्चिम,
उत्तर,
दक्षिण
में चार प्रवेश द्वार,
सुरजपोल,
अजमेरी
गेट,
चाँद
पोल ,
जोरावर
सिंह गेट जिनकी भव्यता देखते
ही बनती है,
अनेक
पुराने रीती रिवाजो पारंपरिक
जीवन शैली के साथ जयपुर एकदम
आधुनिक शहर है। मुख्या शहर
परकोटे के भीतर,
अपनी
गुलाबी आभा बिखेरता,
मोर
मुकुट से कंगूरों से सजे छज्जे
छते,
बरामदे
अपने आप में अनोखे राज शाही
रहन सहन को दर्शाते है। छोटी
चौपड,
बड़ी
चोपड के चारो और सूत बाँध कर
बने दुकाने,
मुख्य
बाजार है। जल निकास की उत्तम
व्यवस्था ,
आयताकार
भूखंड पर बसा यह शहर ,
इस
शहर को कुबेर की नौ निदियों
के प्रतीक स्वरुप बनाया गया
है जयसिंह जी ने इसको
पीले रंग से पुतवाया था परन्तु
राम् सिंह जी ने इसे गुलाबी
पुतवाया महाराजा राम सिंह जी
ने ही जयपुर को आधुनिक स्वरुप
देने की पहल की। शहर के मध्य
में राम निवास बाग़,
शहर
को विस्तार देने के राम बाग़
पैलेस ,
पोलो
खेलने के शोकीन महाराजा ने
पोलो ग्राउंड की स्थापना की
जो आज भी विश्व विख्यात है।
अल्बर्ट हाल म्यूजियम शहर की
शान,
रविन्द्र
मंच नाट्य कला को विस्तृता
देते है। महाराजा कॉलेज,
महारानी
कॉलेज,
सवाई
मान सिंह अस्पताल ,
मेडिकल
कॉलेज,
महारानी
गायत्री देवी गर्ल्स भगवान्
दास बराच (
आज
का सचिवालय,
सरकार
राजस्थान )
मिर्ज़ा
इस्माइल रोड शहर को एक कोने
से दुसरे कोने से जोडती पर्यटकों
का मुख्या आकर्षण है। महलो
में ...
जय
निवास,
शहर
के बिलकुल मध्य में स्थित है,
महलो
में .1775
ई
.
में
बना जय निवास,
शहर
के बिलकुल मध्य में स्थित है।
इसके उत्तर में ताल कटोरा और
राजा मॉल का तालाब थे जिनमें
तब मगरमछ भी होते थे। उत्तार
की पहाड़ी पर गढ़ गणेश है,
साथ
ही अपनी भव्यता सौन्दर्य और
बेजोड़ कारीगरी का विशालतम गढ़
नाहरगढ़ का किला स्थित है,
वहीँ
से जय गढ़ के किले का रास्ता
जाता है जो आज होलीवूड ,
बोलीवूड
वालो की पसंदीदा शूटिंग का
स्थान है। पश्चिम में पुराणी
बस्ती,
और
तब का तोपखाना है। एक किले को
दुसरे से जोडती टेढ़ी मेढ़ी
सुरंगों का जवाब नहीं। सवाई
जय सिंह जी मूलत:
एक
सिपाही थे मगर दिमाग एक इंजिनियर
का पाया था। बड़े पैमानों को
सादगी के साथ स्थापत्य में
प्रयोग किया। राष्ट्रीय
राजमार्ग हो या चौपर से चौपड तक
की सड़के सब एक सीध और दूरी ,
गलिया
ऐसी की आप खो नहीं सकते अंतत:
वापस
किसी न किसी मुख्या सड़क या
चौपड पर आ जाते है घूम कर।
सिरह
ड्योडी को बान्दरवाल का दरवाजा
भी कहते है। राजमहल के चारो
और दीवार है जिसे आम बोल चाल
की भाषा में सरहद बोल जाता
है।
कदम
दर कदम राजसी वैभव,
दरबारी
संस्कृति को प्रस्तुत करता
आमेर का किला ,
किले
के मध्य शहर की आराध्य देवी
माँ ..
का
मंदिर आज भी जिसके भक्तो में
अटूट श्रद्धा है कहते है इसमें
विराजमान माँ काली की प्रतिमा,
महाराजा
मानसिंह को सपने में साक्षात
दर्शन के बाद लायी गई थी। शहर
के मध्य में राजमहल,
वर्तमान
में शहर की अनमोल धरोहर,
पांडुलिपियों
को सहेजे पोथी खाना,
विशाल
चांदी का कलश और अन्य राजसी
साजो सामान का मुजियम .जयपुर
आयें तो देखना न भूले।
राजमहल
की सरहद से सीधे दर्शन होते
है,
शहर
की जनता आम और ख़ास सबके आराध्य
देव गोविन्द देव जी का विश्व
विख्यात भव्य मंदिर,
राजमहल
के झरोखों से साफ़ दर्शन होते
है आराध्य के। मंदिर के बाहर
पुरानी विधानसभा और जलेब चौक
(
रक्षा
दल का स्थान ),
यहीं
वो लोग रहते है जो तीज,
गणगौर
की सवारी का लवाजमा तैयार करते
है,
पहले
के टाइम में ये ही लोग राज की
नगर परिक्रमा की ज़िम्मेदारी
लिए थे। जयपुर के पूर्व में
सिसोदिया रानी का बाग़ और
विद्याधर का बाग़ दर्शनीय है।
आमेर से लौट ते समय आपको कनक
वृन्दावन ,
पुराना
गोविन्द देव मंदिर अपनी मनमोहक
हरियाली छठा और छत्रियों से
आकर्षित करता है और साथ ही चार
चाँद लगाता,
तपती
धुप में पहाड़ो की से आराम
दिलाता जल महल। आज कल यहाँ
मुंबई के चौपाटी का दृश्य बना
रहता है। जयपुर अब आधुनिकता
की होड़ में बड़े शहरों की गिनती
में है,
बड़े
बड़े माल्स,
आधुनिक
खेल,
पिंक
पर्ल वाटर पार्क,
नामी
विश्वविधायालय,
हाइपर
सिटी से सु सज्जित है। फिर भी
छोटी काशी कहे जाने वाले इस
नगर की गलता तीर्थ को नजर
अंदाज नहीं किया जा सकता।
घाट-गेट
से बाहर ,
चूल्गिरी
की पहाड़ी पर बना विशाल जैन
मंदिर इसके पहाड़ो की शोभा है।
....
क्रमश:
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