सोमवार, 19 सितंबर 2022

सफेद कबूतर

 यादें याद आती है ... बातें बातें भूल जाती है .........


यादों  रोकना चाहो तो और याद आती चली जाती है ... कैसे कोई भूल सकता है इस सुनहरे पिंजर में कैद यादों को ... बातों को, नारगी शाम को तरसते दिनो को .... शाम के इन्तिज़ार में पूरे दिन के इन्तिज़ार को, वो जो इन्तिज़ार एक पंछी करता  की छत पर,   

सफ़ेद कबूतर घूमने के बहाने १ हज़ार गज की उस छत के कितने चक्कर न जाने किन चक्करों में करता रहता। पीछे की छत पर संगेमरमर सी वो खूबसूरत सहेली ... उस सफ़ेद कबूतर पर फ़िदा ... अपने सुनहरे  बालो से पानी की बूंदे हवा में छिटकती तो सफ़ेद कबूतर के साथ उसके बाकी २ सांवरे कबूतर भी वहां आ जाते .... बड़े  होते है ये पंछी .... सबको वो एक ही मूरत प्यारी लगती थी 

कोई उसको देखता रहता कनखियों से तो कोई उसको अपनी कहता ... उन २ सांवरे कबूतरों का एक रहीस साथी कभी कभार ... कैंड  बियर ... कुछ वेफर्स या कुकीज या काजू के साथ छत पर चला आता ......... लेकिन वो ..... लगता जैसे उसको पता नहीं था की वो बड़ा हो गया है, उधम मचाता , खाता पीता , मस्ती करता , कभी कोई और मूरत दिख भर जाती मारे शर्म के गर्दन छत में गदा देता फिर न उसके गले बियर उतरती न काजू ... अँधेरा ढलते ढलते वो खुश हो जाता रोड लाइट जलते ही वो अपनी फ़िएट उठा चल देता  , उसके लिए संगेमरमर की वो मूरत ... का होना न होना कोई मायने नहीं रखता .... उसके बचपने को देख लगता ... काश ये ऐसा ही बना रहे .. फिर मन ही मन सोचती मुझे क्या लेना देना भइ .... यूँ ही ... टाइम बर्बाद किया उसकी हरकते देखने में ... लेकिन हाँ कुछ उसकी मासूमियत में था ... की वो दीखता था ये अलग है ... लीक पर नहीं चलेगा ... कॉलेज पार करते करते शादी करदी उसकी और फिर ... वो जब भी आता अपनी दुल्हन के साथ आता .... ख़ुशी होती .. थैंक गौड़ ... ये सेटल हो गया वरना इतना शर्मीला  बंदा ..... वक़्त गुजरा गुजरता चला गया ... फिर वो सफ़ेद कबूतर की शादी में मिला .... उसकी बेटी गोद में थी ,... लेकिन उसका शर्माना वही .... देखता नजरे झुक लेता .. वक़्त पंख लगा कर उड़ता चला गया ....  यूनिवर्सिटी के एक फंक्शन में उसको देखा ... देखा उसने .... इस चेहरे को कहीं देखा है ... नहीं पहचान पाया वो ... और ... मैं .. मैं आज भी यही सोच रही थी अभी तक इस गुण को बरकरार रखा है फिर ... इतने बड़े ओहदे पर हो की स्टेज से सब  देख रहे थे तुम नजरे झुकाते .. फिर उठाते फिर झुकाते .... कैसे न कैसे डायस की लाज रख स्पीच दी ... और मैं खुश थी चलो कुछ तो इजाफा हुआ की तुम माइक पर बोल पा रहे थे ......... पिछली बातें वो वो तो मेरी ऑब्जरवेशन थी .... जो आज फिर से नया मोड़ ले ली ..... इस स्टडी का क्या निचोड़ हो सकता है ... सिवा इसके की यादें तो यादें है ... यादो का क्या .... बातें हाँ ... बातें भूल जाते है ....

सोमवार, 12 सितंबर 2022

हवाओ के नाम

 भास्कर आसमान का हूँ 

और धरा का मान हु मैं . .......

इन् हवाओं में है खुशबुए हिना 

क्षितिज आज लगे ज्यू रंग-ए-हिना 

तारों की पालकी में बैठी सुबहा की दुल्हन 

निकली यादो की बरात से जगमग 

उसको भी रहता इन्तिज़ार सदियों 

सदियों, वो एक जो है तुमसा .....

तुम्हारे नूर सा रोशन वो एक 

जो खुश है सबको खुश देख 

है अस्तित्व उसका इस धरा की 

धारिणी से, दे रहा निरंतर 

खुशनुमा मौसमो की सौगाते 

कर रहा ऐलान हर और जागते 

रहो, करो युग निर्माण, हाँ 

इंसान हो, तुम में हु मैं , मुझ से 

तुम, नहीं थकता चाहे हो कितने 

बवंडर या की काली-पीली आंधियां 

दिखाए कितने ही रूप आग उगलता 

ज्वालामुखी, है नहीं मेरे अस्तित्व से 

बढ़कर, है सूत-समंदर कितने ऐसे 

मुझ में समाये, जब जब हो ... 

जाता है गुस्से का कहर .... हो जाते 

फल सारे कसैले, लेकिन जब 

जाती है कोहरे की चादर समेटे 

सर्द रातों की नर्म गजक सी 

एक दुल्हन मौसमो की ....

लद जाता अंचल धरा का  

फलो  की मिठास से 

हाँ सच ...  कलियों के चटकने से

महक उठते जंगल, खेत, पहाड़ 

और ...कौना-कौना .... और हाँ

वो एक विरहनी करती इन्तिज़ार

बेसुध लपेटे आँचल सतरंगी सा 

नारंगी रंग से लथपथ ... खेली है 

उस संग होली मैंने जनम जनम 

हर दिन .... हर शाम ... वो मिलती 

मुझ से उतनी ही शिद्दत से 

करती इन्तिज़ार हर दिन सांझ ढले 

नहीं नहीं .... सात फेरे नहीं .... मैं 

लेता हूँ उस प्रेयसी के हर पल फेरे 

करता हु प्रेम-आलिंगन और फिर 

जाना होता है उसके इन्तिज़ार 

भरे नयनो से थोडा दूर ....

क्षितिज के उस पार 

ताकि कर सके उसके अपने 

अपने सपनो का कोलाहल शांत 

बुन ले अपने युग के खिलोने 

खेल ले मानव मेरा बच्चा ...

में शापित हु अपने बच्चे के 

शव को ढोने का ....... किन्तु

पिता हूँ सब को पलता हु 

चलता हु अनवरत ... हाँ 

भास्कर आसमान का हूँ 

और धरा का मान हु मैं . 

 @Anita 'RaahiRaaj'