हकीकत सोशल मीडिया की खामख्याली की “दि सोशल डिलेमा” – डॉ अनिता राठी
इंसान के जज्बातों से पहले कुछ मनचले और कुत्सित मानसिकता के लोग ही खेला करते थे | मानव प्रक्रति से ही भावुक और जज्बाती होता है, भावनाओ और हसीन सपनों के सलोने संसार में अनोखेपन को खोजता रहता है | सोशल मीडिया के सच को बखूबी उजागर करती है “दि सोशल डिलेमा” एक फिल्म जो किसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म सी लगती है मगर इंसान की आँखे खोल देती है | और साथ ही देती है एक ऐसा शॉक जिसे सोचकर हम खुद को बुद्धिमान समझदार होने का भ्रम त्याग से देने को विवश हो जाते है और खुद को लुटा सा ठगा सा महसूस करते है |एक ऐसी दस्तावेजी फिल्म जिसके निर्देशक है जेफ़ ओर्लोव्सकी जिन्होंने हमें सोशल मीडिया के छुपे हुए सच को उजागर कर बताया है समझाया है | ये डेढ़ घंटे का एक ऐसा नरेटीव फिल्म के रूप प्रस्तुत किया गया है जिसमे फेसबुक हो या व्हाट्सअप , यू-ट्यूब , ट्विटर, इन्स्ताग्राम में काम करने वाले महारथियों ने खुद सामने आकर एक अल्गोरिइ दम के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझाया है की कैसे वे सोशल मीडिया के माध्यम से आपकी मानसिकता को पढ़ लेते है और इस काम में वे दुनिया के महंगे से महंगे सैकोलोजिस्ट्स की मदद लेते है | फिल्म की तकनीक एकल व्यक्ति – संग – कैमरा साक्षात्कार प्रणाली पर आधारित है यानि सभी महारथी एक काल्पनिक एकल परिवार का सा हिस्सा भी लगते है लेकिन है सब अपने अपने फील्ड के असल महारथी जो एक एक कर एक स्टेज पर आते है और अपने अपने किरदार का प्रस्तुतिकरण खुद देते है की वो कैसे एक एक व्यक्ति की सोशल मीडिया- पहचान यानि आई डी की मानसिकता उत्सुकता को पढ़कर उसे सोशल मीडिया के अधिक से अधिक उपयोग का आदि बनाने की भरपूर कोशिश करते है कैसे वो व्यक्ति के सोशल मीडिया यूज का समय बढवाने में सफलता हासिल कर ले रहे है | और इस सब को एक काल्पनिक परिवार के बिखर जाने में सोशल मीडिया कैसे अंजाम देने में सफल साबित हो जाता है की कहानी को भी बीच में रखा गया है |
90 के दशक तक फ़िल्मी गानों से भावनात्मक लागाव उसके रहन सहन , व्यवहार, तौर तरीको, बोलचाल में साफ़ प्रतिबिम्बित हो जाता था| उसके बाद टेलीविजन और उसके किरदारों का प्रभाव समाज में साफ नजर आने लगा | टेलीविजन पर व्यक्ति के जज्बातों और भावनाओं से जोड़कर प्रत्येक प्रकार की वस्तु के विज्ञापनो की बाढ़ सी आ गयी और इंसान के दैनिक जीवन में वे वस्तुए आम तौर पर शामिल होने लगी जिनका अस्तित्व बाज़ार में तो था मगर लोगो तक पहोंच बहोत कम होने के कारण जिसे जिस वस्तु की अति आवश्यकता होती वो ही व्यक्ति बाजार जाकर उसकी जानकारी लेता और खरीदता | व्यापारी लोग चतुर होते है अपनी वस्तु कैसे किसी गैरजरुरतमंद को भी बेच कर अपना व्यापार करना है ये उसका हुनर होता है, किन्तु भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां आज भी 65% आबादी गाँवों में रहती है वहां फैशन, मनोरंजन और घर की आन्तरिक बाहरी साज-सज्जा, लेन देंन दैनिक व्यवहार में अपनि आय के अनुरूप ही खर्च किया जाता रहा है| आय-व्यय का एक संतुलित तालमेल बनाकर चला जाता है| किन्तु आज इन्टरनेट वाई फाई, मोबाइल, सोशल मीडिया का ज़माना है और प्रत्येक व्यक्ति के पास लैपटॉप , मोबाइल , कम्प्यूटर है , हजारो तरह की इन्टरनेट एप्प , वेबसाइट है ऐसे में व्यापार का तरीका भी बदल गया और व्यापार का अहम हिस्सा उत्पाद की मार्केटिंग का तरीका भी बदल गया है | जिस प्रकार सोशल मीडिया जब अस्तित्व में आया तब हम सब इसे खेल खेल में काम लेते थे फेसबुक हो या व्हाट्सअप , यू-ट्यूब , ट्विटर, इन्स्ताग्राम इनकी सबसे बड़ी खूबी ये की ये हमे ये जताते है की ये सब सुबिधाये हम मुफ्त में काम ले सकते है और हमारी इसी मानसिकता को सोशल मीडिया के टॉप संचालको या कहें इनके जन्मदाताओ की तीक्ष्ण बुद्धि ने खूब भांपा और पूरी दुनिया के लोगो को बाजार आधारित व्यवस्था के पुराने सबब में बदल दिया | कहते है ना की अगर आपसे किसी वस्तु या सेवा का पैसा नही लिया जा रहा है तो मान के चलिए की आप उपभोक्ता ना होकर खुद उस वस्तु में बदल चुके है जिसे बेचा जा रहा है | इसी सबक को आज फेसबुक हो या व्हाट्सअप , यू-ट्यूब , ट्विटर, इन्स्ताग्राम जैसी सोशल मीडिया सेवाओ के संदर्भो में देखेको तो हमारा खुद को इन सेवाओ का उपभोक्ता समझना दरअसल किसी खामख्याली से ज्यादा कुछ नही होगा | इन सब सोशल मीडिया साइट्स पर हम जो समय व्यतीत करते है ये ही हमें वो वस्तु बना देता है जो उपभोक्ता ना रह जा कर इनके मालिको की वस्तु बन जाती है | ये लेख एक चेतावनी है खासकर हम भारतवासियों के लिए, कैसे ..... ? इसके लिए एक बार जरूर देखियेगा ये फिल्म “दि सोशल डिलेमा” ।
डॉ अनिता राठी,
जयपुर- राजस्थान