सोमवार, 18 अगस्त 2014

यादें तो यादें है....



मेरे प्रिये तुम मुझे पागल बनाते रहो ... और ये मान कर खुश रहो की मैं बन गई तुम्हारे पागल बनाने से ...क्यूंकि इस अहसास का अहसास भी मजेदार है ................................जब लोग बहोत समझदार हो जाते है तो मुझे वो और उनको मैं ...पागल नज़र आने लगते है ... किसी किसी के तो बस सींग ही नहीं उगे ... वर्ण लोग दूर से भांप लेते की कोई स्पेशल पागल आ रहा है ... क्यों बिना बात के नकाब पहन कर घुमते हो .. इंसान बने रहो काफी है ...


........ ये संवाद .. आत्मा का आत्मा से, देह का क्या भरोसा ... रोज सुबह नई हो जाती है ... जी फूल का खिलना ... खुशबु ... देना और फिर मुरझा जाना , देह की गंध ... देह की गंध ही तो है ... देह आत्मा का मंदिर ... लेकिन मंदिर में धुप बत्ती ... दिया ... किया ... तो मंदिर नहीं तो मसान... आत्मा सुवासित है ... आत्मा की आत्मा से मैत्री हो ... मित्रता तो थी ... ही मैत्री होतो देह और सुवासित होगी .. महकेगी ,, दमकेगी ... क्योंकि आत्मा खुश होगी ... मुझे देह की गंध पसंद है लेकिन ...तब तक जब तक आत्मा सुवासित हो महक न उठे .. 

विज्ञान ने ये समझने में मदद की ... है ... है न ... गुड नाईट


यादें तो यादें है जिंदा है हम यादों में ... अर्थियां उठ गई कुछ अनकहे ... ना समझे ... ख्वाबो की ... ढोते है लाश मुर्दा बेचैनियों की ... यादें तो ... जवान हो रही है ...


.... अंधेरो में डूबे ... गहरे समंदर के सीने पर .. कदम दर कदम ... मैं एक मकड़ी की तरह चलती चली जा रही थी ... आदतन एक जाला भी बुना था ... कभी वापस उस जले में लौट आती जब जब ज्वार आता समंदर की छाती फटने को होती ... लहरे किनारों को भिगो जाती ... बूँद बूँद मेंह बरसता ... और मैं फिर उठ कड़ी होती ... ये सोच कर की कभी तो उस पार पहुँच जाउंगी ... हर बार जाले का मोह .. मस्ती खींच लाती ... याद रहते है कुछ मंजर भूलते ही नहीं ... या यु कहूँ ... फेविकोल का जोड़ है ... जीवन .. और... जीवन से जुडी यादें .. भूलती ही नहीं ... फिल्मीक रील ... रियल रील के बीच फंसी जिंदगी और इसकी जद्दो जहद ... इधर मकड़ी उलटी लटकी नहीं की ...जाला बगावत कर देता है ... टूट जायेगा .. बिखर जायेगा .. तार तार दिखेगा .. मकड़ी ... वो चलती जायेगी ... इस आस के सहारे की ... वो किनारा पकड़ लू ... इस जाले के साथ साथ ... ताकि फिर लौट लौट आने का ... झंझट न हो ... मकड़ी ने ठान लिया ... समंदर के जीवो को कुछ न कहेगी , जानती है ... केंकड़े , मगर , मीन सभी उस की तरह किसी न किसी जाले में फस्से है

तुमको क्या हुआ ..... मस्त रहो ... भागो .. मृग मारीचिका में अंधे हो कर ... जब पहुंचोगे ... तो पता चलेगा ...हकीकत में प्रेम ... मकड़ी का था ... दूर रेगिस्तान में ... पानी का दिखना ...तो ... मृगमारीचिका ... और .. तुम्हारी प्यास भी तो ... मृगतृष्णा है ...

क्रमश : ...

रविवार, 3 अगस्त 2014

मित्रता

मित्रता


मेरी आँखों में देखा कर जब में बात करता हु
मित्र हु तेरा मेरे मित्र तेरी हर अदा से प्यार करता हु

तू जुल्मी है मैं जुल्मो में बसर रात करता हु
तू जालिम मुझ पर कर सितम मैं तुझ से जज्बात रखता हु

तेरी फितरत सब समझता हु फिर भी
तू तेरा सा ही रह मैं तेरी खुदी से बड़ा लगाव रखता हु

नादाँ है तू या मैं ... ओये... क्या फरक पड़ता है
चल कल जो किया फिर वापस आज करते है

तू दे चाय के पैसे तो फिर चाय पीने चलते है
मेरे पास तो कल की पिक्चर के फटे दो टिकिट रखे है

तेरे दोस्त बहोत है तू और भीड़ लगा ले लेकिन
मेरा तो दोस्त पक्का है पक्का ही रहेगा ये समझ ले लेकिन

कल चक्खि थी बाजार से लेकर जो चीज
कड़वी थी साली पर क्या चीज़ थी है न

टीचर ने कल जब मारा था तेरे गाल पर थप्पड़
आंसू मेरे गरम बाह निकले थे पता नहीं क्यों

ये ले मेरे नोट्स तू पढ़ ले मुझे दे कुछ चिल्लर
शुक्रवार है पहला शो है चलता है चल मजे करे चलकर

चुइंगम खा कर चिपकाए थी कल जिसकी सीट पर तूने
आज वो लड़की मुझे ले गई प्रिंसिपल के पास पिटने

कौन मरता है यहीं किसी के लिए
हम जान देंगे दोस्तों की दोस्ती के लिए ... आमीन