बुधवार, 3 अप्रैल 2024

आग उगलती कलम

 लिखती होगी  तु आग 'अनु

मत लिख उनको  तु बदनाम अनु 


अच्छे दिन तो गए भाड में अनु

जो थे  जैसे थे वो भी लूटाये अनु 


वो रंगते आये हैं दर-दिवार लाल 'अनू 

तु अपने काम  से काम रख अनु 


लिख लिख कर ना आंखे फोड 'अनु 

एक दिन य़े पूछ लेंगे तेरा नाम पता अनु 


कहते थे  दाने दाने पे लिखा हैं एक नाम अनु 

मत भूल गोली गोली पर भी लिखा हैं एक नाम अनु 


लिखती  होगी तु आग 'अनु 

रख  अपने काम से काम अनु ll


Dr-Anita Rathi प्रतिबद्ध

हीर

 हीर हो जा अनु 

गर  ईश्क मे हैं ...

य़ा 

कोहीनूर  हो जा अनु 

गर  धूल मे हैं 

य़ा 

कोई बात नही तुझमे अनु 

गर तो कोई बात नही 

य़ा 

क़र दर्द की बात 

गर ना हो दर्द का इलाज 'अनु'  

य़ा 

ऐसा कर कुछ लिख अनु 

कलम भर आंसूओ से 

और

 भीगो कागज का सीना अनु 

य़ा 

जी कुछ ऐसे अन्दाज  से 

गर जीना हैं ज़रूरी अनु 

य़ा 

 फिर फारी हो दुनिया से 

और अपने काम से रख काम 'अनु '


#AnitaRathi - 30/01/2018

तुम कहो तो

 सुनो

तुम कहो तो

मैं भी कह दु

जो कहना था

बरसो पहले की

कुछ कहना है मुझे

सुनो

तुम कहो तो 

कह दु की कुछ

तितलियों की रंगीनियाँ

चाहिए तुम ल दो

वो रंग वो उड़ान

और वो चाहत 

मासूम दिलो को जो

भा जाए और लगने लगे

की हाँ यही जीवन है

सुनो 

तुम कहो तो कह दु

जो कहना था मुझे।


डॉ. अनीता राठी

रंग पे रंग

 ज्यादा तो कुछ नही 

मगर रह रह कर

 उसका रंग बदलना

 याद आ जाता है,

होली जब जब आये है

वो वक्त पर उसका 

मुकरना याद आ जाता है

चाँद पूनम का और रंग सफेद

फिर उस पर गुजरे दिनों का

वो स्याह अँधेरा याद आ जाता है

बिखर कर मोती की माला से

कुछ किरचों में खुद का 

बिखर जाना याद आ जाता है।

उस परिंदे के पँखो की गर्म हवा

में खुद को पिघलते देखा था

और फिर पिघलकर पत्थर हुआ

दिल, दिल का यूँ 

खुद में सिमट जाना

याद आ जाता है ।

सब रंगों से ऊब गयी हूँ

अब रंगों में रंग सफेद

ही मन को बहोत भाता है। 


Dr-Anita Rathi

हासिल

 रोने से क्या हासिल 

जो समझ ना पाए

मुहब्बत को अ दिल

वो क्या समझ पाएंगे

दर्द पराए  अ दिल।


आग लगेगी बस्ती में

जब ख्वाबो की उनकी

शायद याद आये उनको

कागज की कश्ती भी 

उनको उस दिन । 


बैठ कर इत्मीनान से 

वो देख रहे थे तमाशा

सेहरे के सुर्ख फूलों से

मेरे अरमानों के जनाजे का।


अब जब जख्मो को सी लिया

तुरप तुरप हमने या रबं

क्या करोगे यूँ मेरी आवाज से

अब अपनी आवाज मिलाकर ।

कविता

 तनी हुई थी वो पत्थर की दीवार सी 

मैंने एक दिन उसे विक्षोभ से ढहते देखा

गुरुर जिसे घेरे था जिन कंकरो का

मैंने उन कंकरो को उस अभिमान पर बरसते देखा

जानकर ठंडी छाया जिन कोपलों की हरे रंग को वो बैठी थी गुरुर में

मैने उस गुरुर के पतझड को होकर पत्ता-पत्ता बवंडरों के साथ उड़ते देखा ।

Dr-Anita Rathi 

3/April/2021

रविवार, 28 जनवरी 2024

कविता

 शब्दो मे इतनी जान तो होनी चाहिए कि 

किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट ला सको 

न ला सको तो रुला तो सकते हो शब्दो से

या फिर घुस जाओ किसी के दिल दिमाग मे

शब्दो मे इतनी जान तो हो कि खुद ना नाचो

मगर किसी को नचा सको शब्दो ही शब्दो मे 

शब्दो मे इतनी जान हो तो लिखो 

वरना दूसरों के शब्दों का एहसान ले लो

या चुरा लो copy paste करके ।


         

कविता

 कुछ ख्वाब 

उसके 

मेरे कमरे की 

एक 

किताब में 

संजोकर

रखे है ।

ताकि पढ़ लू

जब जी 

चाहे 

Dr-Anita Rathi

कविता

 मुझे नदी होना है

मैं गहरी होऊ

चाहे जितनी मगर

मिलना है समंदर से

ताकि खो जाउ

एक वजूद होकर।

मैं जी लू

अनन्त अनगिनत 

गहराईयों को

और तार दो

तुम मुझे इस

भव से । 

Dr-Anita Rathi

कविता

 भीगी थी बारिश में मैं 

और कई कई बरिशे थी पलकों में 


भीगे थे मेरे सपनों के पंख 

और नयन  हुए थे नदी का रुख 


झरने लगे शब्दों के झरने 

रूह हो रही थी पानी पानी 


शोर कर रहे थे अरमान  

छेड रही थी पगली पवन 


देख अकेली लगा छेड़ने  

वो एक आवारा बादल 


भीगी थी बारिश में मैं 

और कई कई बरिशे थी पलकों में


-@डॉ अनिता राठी

कविता

 सुनो

तुम ले लो ये

तुम्हारा कच्चे सूत

का स्नेह 

ये तकली और ये

तुम्हारे ख्यालों का चरखा

और

लौटा भी दो

मुझे मेरी खामोशियों

की नींद। 

सुकून और बेकसूर ख्वाब

या

रखो हिना रची हथेली

पर अपनी ये हथेली

और करो

मन का पाणिग्रहण ।

डॉ. अनीता राठी 21।01।2024

यादें तो यादें है

 हाँ #kalyugi  हुँ मैं 


मैं रिश्तों की गुलामी नही मैं रिश्तों की कद्र करती हूं, हर एक रिश्ते को खूब जिया समझा और फिर उकेर दिया जो जैसा था उसे शब्दो मे , क्योंकि कलयुगी हुँ मैं। 


और आज मेरा बरसो का इंतिजार काम आया जब मेरी कलयुगी की चुनरी लहराई ... शब्दो की इस संरचना को आज बोधि प्रकाशन ने पूरी साज सज्ज़ा के साथ मेरे सुपुर्द करने का मानस बनाकर ये चुनरी ओढाई ...


Thrilled to See The Cover Of my Second brain child my  New Book of 100 structured English Poems  #KALYUGI

यादे तो यादे है यादों का क्या

 उसने कहा आ जाओ अंदर डरो नहीं ...दिल है मेरा ईट  का मकान नहीं

 ..डरते डरते जा बैठी एक कोने में ..सहसा नज़र घुमा के देखा ..बहोत घुटन थी ... उसके दिल की काली कोठरी में खुंटिया तो थी नहीं .. कच्चे सूत की तनी थी तनी पर कड़िया पिरोई थी जिसमें लटकी थी कुछ रोती हुई आत्माएं ... मैंने पुछा सुनो...

 ये कौन है ?? 

...ये वो पागल औरते और लडकिया है जो ये समझती थी की मैं इनको चाहता हु ... प्यार की मारी है l

... मैं मरने वाली ho गई थी उस के प्यार मैं बस दिल में कभी इतने करीब से ना झंlखा था उसके

 ... मैंने कहा सुनो .. बाकि की कड़ियों में ..तुम्हारी अंतरात्मा के टुकड़े लटका लेना ... मेरा  ... नाम भूल जाओ .. ले जाओ अपनी यादो की बरात वापस ......

यादे तो यादे है ....