गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

बचपन से अक्सर देखती हु दोस्तों को रंगबिरंगी पतंगों के पीछे भागते ... घर के दालान में लगी थी बाढ़ देशी गुलाबो और तरह तरह के फूलो की रंग बिरंगी तितलियों  को पकड़ते साथी .... ना कभी किसी पतंग को पकड़ने की ख्वाहिश हुई न किसी आकर्षित करने वाले जीव की तरफ भागने की ... की पा लू लपक कर छीन झपट कर .... क्यों ... क्यूंकि इतनी प्यारी प्यारी तितलियों में से एक तो ऐसी होती थी जो मुझे पाना चाहती थी और में बहोत खुश होती  जब एक तितली मेरे काँधे पर या हाथपरा बैठती ... आज भी कबूतरो के झुण्ड के पास जाकर एक आध घंटा उनको अठखेलिया करते देखती हु ... फिर कोई एक कबूतर आकरहाथ पे छू जाता है तो सोचती हु ...बास इतना काफी है .... भागना नहीं  किसी के पीछे ... इंतिजार करना  ... बस ...इन्तिज़ार ... नया साल आता होगा ... खुद चल कर आएगा   

व्यापारी .. इस हाथ दे उस हाथ ले ... रिश्तो की नर्माहट गर्माहट कहाँ खो आते है पलभर में . बच्चो जैसी बातो पे लड़ तो लेते है ..तुम हमारे घर नहीं आयेहम क्यों आये ...तो फिर बच्चो की तरह एक हो भी क्यों नहीं जाते .. हर पल खुश रहो की सीख देना बेमानी सा लगता है ... और जो हर पल खुश ही हो वाकई में .... वो इस जहां का कहाँ लगता है

बड़ी अजीब शय है ये इंसान नाम का परिंदा ..  उम्मीदों और ख्वाहिशो का पुलंदा और अंतत:  उम्मीदों और ख्वाहिशो के साथ सिमट कर समय की दादागिरी के आगे अपने ढाई दिन के झोपड़े से  टुकुर टुकुर निहारता रहता है ... करे भी क्या न ... आसान हा उम्मीदों और ख्वाहिशो को पाल लेना मुश्किल है उनका परिणय समय से गठबंधन .... 

पुराने को अलविदा ...??? 

पुराने को अलविदा ...???

पुराना तो बहोत अजीज होता है चाहे साल हो या सवाल  पुराने से रिश्ता गूढ़ होता जाता है पुराना घर पुराना दोस्त पुराना पडोसी पुरानी किताबे किताबो में राखी  वो डायरी ... और उस डायरी के एक एक पैन पर खींची वो ज़िगज़ाग  लाइन ... कितना अपनापन होता है उस पुराने दर्द से जो दिल के किसी कोने में रिस्ता रहता है जिसकी किसी भी याद को आपने साल दर साल नयी नहीं होने दी क्यूंकि पुराना साल लौट के नहीं आता मग नया जब तक पुराना नहीं हो जाता तब तक अपना सा लगता भी कब है