बुधवार, 8 जून 2016

नारी - जब जब वो लिखेगी

जब जब वो लिखेगी 
मुस्कुराती हुई कलम 
आसुओ में डूब जायेगी
कागज़ भी उसकी नमी को 
अपने सीने में न सोख पायेगा 

जो पढ़ेगा औरत की कहानी 
सदियों तक अपने गरेबान 
उठा कर न चल पायेगा 
लो ... 
देखो क्या अब ये भी मेरी 
कलम ही बताएगी
कल किस माँ की अस्मत से 
कोई बेटा खेल आया 
कल एक बेटी के गेंसु
एक भाई शर्मसार कर आया 
गर्भ में लिए एक सदी का मानव 
चोट सह रही थी सभ्यता 
कुछ वहशियों के हवस की  
मर रही थी संस्कृति
अनखिली , देख रही थी 
तमाशा बर्बरता की हदो का 
निकल निकल आ रहा 
सभ्यता के तहखानो से 
..... देख लो 
मुस्कुराती हुई कलम 
आसुओ में डूब जायेगी
जब जब औरत औरत का 
दर्द दर्द में भीगे शब्दों में सुनाएगी .    

नारी





















2.  पथ संगिनी 


प्रकृति ने दिखाया ऐसा रूप है 
वासना के सुख की खातिर 
इंसान ने गंवाया सुख-चैन है 
एक बार नहीं कई  सौ बार दोहराया है 
माँ, बहन, बेटी  हो या हो अर्धांगिनी 

है नारी  जीवन पथ की संगिनी 

 तक था भ्रम तुम्हे तारण-हार होने का 
गंगा  सर पर धारण हार होने का 
शिव होने का, शास्वत होने का 
गर्व सब धूमिल सा हुआ सर्वशक्तिमान होने का 
समझाओ मुझे की वो तो मिटटी की  थी 
अस्सी साल की बूढी थी, ..... तो क्या 
ये हाड मॉस का पुतला पञ्च तत्व का नहीं 
तो क्या ये मिटटी ना होगा,
तो क्या ये अस्सी साल का न होगा ..... 
.तो धारित गंगा क्या  अपना रोद्र 
रूप न दिखाएगी  सीख लो पूरब वालो 
एक दिन ये गंगा जड़-शास्वत
को भी बहा ले जाएगी।

है नारी  जीवन पथ की संगिनी 



3.   मानवता की तलाश में
अंधियारे पलो में
तब जब सूरज की आँखे घूरती है धरा को
तुम मखमली नारंगी बिस्तर पर
कुछ पल आराम को,
पश्चिम की नारी सी सजी
हालाँकि हमारी सी चुडीयाँ सजाई है
नाजुक कलियों में, खनकती सी कहीं
रसोई के कोनो से , लगे है जिंगल बेल
हलक से निकलती अधूरी सिसकियाँ

.... क्यों ... क्यों ... बंधी हो इन चूड़ियों से
किसने मजबूर किया तुम्हे आंसुओ
से बांध जाने को , बताओ किसने बाँधा तुम्हे
और क्यों हर वक़्त का रोना इस जहां में
.....
और फिर किसने कहा जियो ही
ऐसे जहां में , .... एक सुभा होगी जब तुम
आराम से होगी, पलकों पे मुस्कराहट होगी,
तुम्हारी ये कलियाँ आज़ाद होंगी
दुःख, चिंता और भय की जंजीरों से
.....
बेमन से ऑफिस और घर के बीच
के तंग गलियारों में नाचती तुम
ता ता थैया की ताल पर थिरकती तुम
आँगन की कलियों के रुदन पे भी
रूकती तुम, किसने तुमको रोका या के टोका
नहीं तुम इनको सींचो संस्कृति के सुवास से
इनको पूरो स्नेह और प्रेम के गंगाजल से
क्यों रोकेगा कोई, मुरख नहीं है के
बैंक बैलेंस घटाएगा, कटोती करेगा अपने सपनो में
सपने और उसके अपने, तू कौन तेरा कौन
ये नाच क्यों , इतना मत नाच की आँगन
टेढ़ा दिखने लगे, सम्हाल और सम्हाल ले
आँगन और आँगन की बगिया को
देशी गुलाब बहोत महकता है,
विदेशी तो शो केस में सजता है
तू किसी तलाशती फिरती
इंसान तो समझदारी से मिला करते   है।



4. तुम सदा ही छली गयी

खुद अपने से छली गयी
अपने अपनों से छली गई
प्यार के काछे धागे के नाम पर
बन्धनों में बाँध बाँध छली गई 
पिता बन पुरुष ने सिखाया 
तुम्हे साहसी होने का हुनर,
भाई बन पुरुष ने सिखाया 
तुम्हे हिम्मत  से डटे रहना 
माँ बन तुमने सिखाया 
रोटी गोल बना न 
और इसी लिए तुम अब 
आदि हो गई हो किसी न किसी 
दिशा सूचक की , रेत की 
घडी पर फिसलती , दरकती 
इन् बैसाखियों की, ....... 
लडखडा जाती हो जब नहीं 
रहती साथ ये बैसाखियाँ 
बैसाखियाँ , बैसाखियाँ ही होती है 
टूट जाती है, थक जाती है अपना 
महत्व बनाये रखती है और जब टूटने 
लगती है तोड़ जाती है तुम्हे और 
 जाती है तुम्हे हवाले पराई बैसाखियों के 
तुम घायल, लडखडाती सी तुम 
कर लेती हो सहर्ष स्वीकार 
 दीमक लगी बैसाखियाँ ...
सीली , गली भीतर तक ,
और फिर चलती हो असुरक्षित 
 सम्हली तुम  गिर गिर 
पटखनी खा खा   होती हो 
फिर गिरती हो , पिटती हो 
उसी बैसाखी से ...

5. साथी है वो बैसाखी नहीं।

..............फिर पालती हो 
और कई नाजायज बैसाखियाँ 
ब्याहती हो किसी और की सुहाग सेज 
के फूलो को, बन जाती हो ... भाभी-देवर की,
एक और बैसाखी रखती है हक अब 
तुम बंद हो बैसाखियों के बांस 
के जंगल में, जब एक एक कर 
बांस बड़ा होता है तुम्हारे 
कद से कई कई गुना रातो रात 
और तुमने खो दिया खुद को 
रही तुम अधूरी हर पल ले 
साथ बैसाखियों का, चुना तुमने 
खुद की खुदी को , और बन रही 
.."अर्ध-सत्य" .. 
6.   "अर्ध -सत्य"
हाँ अर्ध-सत्य की प्रतिमूर्ति तुम 
 लेकिन आधा, अधुरा इंसान
  हाँ अर्ध-सत्य की प्रतिमूर्ति तुम 
 लेकिन आधा, अधुरा इंसान
जागो तन्द्रा की खूबसूरत 
कैद से बनो पूर्ण स्वयं
सजो  खुद सी, खुद ही की खुदी को 
ना पहनो कंगन उधार के 
ना रचो मेहँदी किसी
मसीहा के नाम की 
रचाओ  रंग--हिना
कच्ची-कोमल हरी हरी पत्तियाँ
चुन चुन, ताकि महको 
और महकाओ उसका अंगना
प्रेमी-प्रियतम का अंगना,
ओढो लाल चुनर हर सुख 
सजाओ मांग बिन मांगे 
सिन्दूर उधारउठो 
अपनी ही  से ,  
देखो दूर क्षितिज को 
 अपने आसमान की उचइयां
बनाओ अपनी ही सीढियां 
और चलो अपने इरादों पे 
खूब टहलो सपनो के शीश-महल में 
लान्घो  लक्ष्मण रेखा
पहचानो खुद
रावन को नहीं
 .....जीवन के दशानन को 
नहीं पुकारो अपने राम को 
क्योंकि  तब होगा
किसी मृग मरीचिका में 
उलझा उलझा
जान कर अनजान 
ताकि कर सके तुम्हे
अपने मर्जी के 
बन्धनों के हवाले ,
या दे-सके तुम्हे 
कई कई वनवास ,
 देश निकाले लव-कुश 
हो जाने के बाद,  
फाड धरती की कोख 
वो निकाल लेगा अपने जैसा,
ओर फिर घडेगा 
कई कई राम,
और समाती रहेंगी 
माँ की कोख की लाडली
 समझो पुरुष के आदेश 
वो छाएगा बन कर धुँआ 
बे-वक़्त, धरती की परतो में 
वो छाएगा बन कर धुँआ 
तुम्हारी आत्मा पर
आतम की आवाज़ पर 
और फिर कोहरे सा 
जम जायेगा, तुम्हारे वजूद पर 
.... और तुम्हारा सब कुछ 
हवाले  उसके खिलोनो के डब्बे 
के जिसमे साथ तुम्हारे 
होंगे, प्लास्टिक के कारतूस 
हा हा आहा ! और होगी 
नकली बन्दूक ... हर पल 
रहोगी तुम डरी डरी ,,, वो 
वो खेलेगा,  और देगा फेंक 
सुहाग सेज से सीधे पाताल 
में। समझोगी तब बैसाखियों 
पे  चलना,  पुरुष नहीं  
दुश्मनहै वो साथी हाँ 
साथी है वो बैसाखी नहीं।



7.   हौसला रख फूलो में पलने वाली


हौसला रख फूलो में पलने वाली 

कांटो पे चलना जमाना सिखा देगा 

चुप क्यों है कुछ तो बोल 

प्रेम, ममता लूट गई तो क्या 

आग उगल आग ही उगल 

अ: भारत की नारी आग उगल 

हौसला रख फूलो में पलने वाली 

कांटो पे चलना ज़माना सिखा देगा 

अब न रही तुम राधा , रुक्मणी 

मेरी प्यारी अब तुम हुई 

लिव इन रिलेशन की मारी 

भाई खेल रहा , पडोसी खेल रहा 

तू खुद तो अपनी अस्मिता से न खेल 

आन रख मान रख शान शेरनी सी रख 

अपनी खुदी का सम्मान रख 

हौसला रख फूलो में पलने वाली 

कांटो पे चलना ज़माना सिखा देगा 

तू अपने तन को कर ले पसीना 

पसीना, चक्कर खा, घुटन सह 

क्योंकि नियत में खोट इनकी है 

तन ढांक ले तू तेरा दम घोंट ले 

हौसला रख फूलो में पलने वाली 

कांटो पे चलना ज़माना सिखा देगा