रविवार, 30 जून 2013

Aameen .. लिख कर अपना नाम हथेली पर हिना से मुझे गुमनाम कर गया जाते जाते

सुकून मुझे दे गया वो जाते जाते
याद आता रहा लम्हा-लम्हा,
हर लम्हा जाते जाते ...

एक उम्र गुजार गया हर पल में
एक एक पल जाते जाते

लिख कर अपना नाम हथेली पर हिना से
मुझे गुमनाम कर गया जाते जाते

शाने से अपने लगा कर यूँ
जी भर भर कर मुझे वो
रुला गया जाते जाते

कह कर बड़े अदब से खुदा -हाफिज
बिस्मिल्लाह जिंदगी कर गया जाते जाते

अब सो भी जाओ सितारों
पलके बंद हो तो देखू उसको
वो तो दे गया मीठे ख्वाब जाते जाते .... Aameen


शनिवार, 29 जून 2013

ना- उम्मीदगियों में एक उम्मीद बन कर आये हो ना-सबूर-ए-धडकनों की उम्मीदो-आफताब बन कर आये हो

ना- उम्मीदगियों में एक उम्मीद बन कर आये हो
ना-सबूर-ए-धडकनों की उम्मीदो-आफताब बन कर आये हो
जिंदगी के दो रस्ते पर  मेरे हमराह बन कर आये हो
ज़माने की ना-इन्साफियों में फ़रिश्ता बन कर आये हो
ना- उम्मीदगियों में एक उम्मीद बन कर आये हो
ना-सबूर-ए-धडकनों की उम्मीद बन कर आये हो
 टूटती साँसों में चराग-ए- नूर बन कर आये हो
 मिलकर तुमसे यूँ लगा दरकती जिंदगी में एक आस  आये हो
ना- उम्मीदगियों में एक उम्मीद बन कर आये हो
ना-सबूर-ए-धडकनों की उम्मीद बन कर आये हो
हो तुम ताज किसी नूर-ए-चमन का मेरे मुमताज बनकर आये हो
धू-धू कर सुलगती सिसकियों में आब-ए-बौछार बन कर आये हो
ना- उम्मीदगियों में एक उम्मीद बन कर आये हो
ना-सबूर-ए-धडकनों की उम्मीद बन कर आये हो
बे-ख्वाब सी सुरमा-दानियों का सुरमा-सुरमई बन कर आये हो
आजमाइश-ए-तकदीर के ताल्लुक-ए-तस्लीम बन कर आये हो
ना- उम्मीदगियों में एक उम्मीद बन कर आये हो
ना-सबूर-ए-धडकनों की उम्मीद बन कर आये हो
रूह-ओ-बैचेनियों में सलीका-ए-सुकून बन कर आये हो
न फ़िक्र करो मेरी यारा मेरी तिश्नगी के तुम दरिया-ए-आब आये हो
ना- उम्मीदगियों में एक उम्मीद बन कर आये हो
ना-सबूर-ए-धडकनों की उम्मीद बन कर आये हो ..... aameen

शुक्रवार, 28 जून 2013

Aameen...

(42)
.. आओ  ... आज आजमा के देख लो  
मेरी किस्मत के सितारों मुझको 
ये  रोज रोज की कसरतें मंजूर नहीं मुझको 

(43)
ये   जरूरी तो नहीं की 
हर बात पे हामी भर लू 
आ आज कुछ वादे कर लू,
 के तेरी हर बात को अपनी जुबां कर लू 

(44)
शाम को करीने से सजा लो 
भँवरे करे लाख कवायदें 
ध्यान -चश्म में इनको डूबने दो 
शाम को करीने से सजा लो 

कलियों को मुस्कुराने दो 

(45)
दर्द--दिल की ना पूछो दोस्तों कभी ये तेरा  कभी ये मेरा सा लगे है 
हाँ मुहब्बत में गाफिल हर दिल अब मुझे मेरा सा लगे है  ........... 

(46)
है मुहब्बत तो जताते क्यों हो ,  महफ़िलो में  तमाशा बनाते  क्यों हो 
 बहोत गर्जिश है आपके जज्बातों में, यु सरे-आम नुमाइशे  क्यों हो 

(47)
है ये हुनर तेरा या -रब, की ले रहा साँसे दम मेरा भर भर कर  
वरना मुहब्बत का सबब, तो ताज -महल में ढल जाया करता है 

(48)
शीशे की कद्र मयकदो से कहाँ 
कीर कीर कर दिए जाते है पैमाने 
अक्सर, होश खो जाने के बाद ...आमीन 

बहोत हो लिए जिन्दा - दिल बालों में खिजाब लगाने वालो

 

बड़ी बड़ी आदर्श की बाते करने  वालो ,
  कोई एक आदर्श अपना  कर देखो    
 
 बांटते रहे उपदेश हमेशा खुद को खुदा कहने वालो,
 हो अगर थोड़ी सी इंसानिय तो दुःख किसी का बाँट कर देखो 

 बहोत हो लिए जिन्दा - दिल  बालों में खिजाब लगाने वालो 
 गर हो इंसान तो थोड़ी मुस्कुराहट बुजुर्गो से बाँट कर देखो 

गुरुवार, 27 जून 2013

Yaadein-10


....यादे याद आती है ....बातें भूल जाती है

.........  यादें ... कुछ तो था चाय के पियाले में यूँ ही नहीं तूफ़ान आया था, लहरों की तरह यादें दिमाग में ...  बातें जेहन में, किसी का बस नहीं चलता जब यादों के तूफान आते है। बेबस सी, बस स्टैंड पर खड़ी, मासूम चंचल निगाहें, निगाहों में पल पल बदलते सीन, कभी हकीकते तो कभी ख्वाब, ख्वाबो में भी वही एक सूरत ... कुछ ख़याल कर गर्दन घुमाई, तो देखा बस आ गई थी .... न जाने क्या सोच कर जाने दिया बस को ....... बस आई और चली गई उसे  से पता था अब अगली बस २० मिनिट बाद आएगी , कुछ लम्बी सी सांस लेकर उसने हलकी पैरेट ग्रीन साडी के लम्बे पल्लू से चेहरा पोंछ .. वापस ख्यालों में खो सी गई, एक दक्षिण भारतीय सभ्य महिला ने टाइम पुछा , वो खोई सी किसी और का ही चेहरा ढूंढ रही होजैसे ..... फिर भी ... हेलो मेडम ... की-ता-ना टाइम ... बताती आपकी घडी, वो कुछ न बोली .. उस महिला ने न मालूम क्या सोच कर .... झट से कहा .... इल्लै मलयाली ...  उसका सांवला रंग, काले लम्बे बालो की कमर के नीचे तक झूलती छोटी, चंचल निगाहों पर मुस्कुराता चेहरा देख उस महिला को वो उसी के जैसी लगी ... ये भी क्या कम है  में वो सबको अपनी सी लगती। शाम ढल चुकी थी ... हल्का अँधेरा पसर गया ... सावन का महिना भी कैसा होता है ....  खवाबो को दुनिया में कोई बादल मंडरा कर , कभी भी दिल की जमीं को भिगो जाता है और मन चंचल ... भीगी बरसातों में कुलांचे  भरने लगता है ... बारिश की बूंदों में नाचने लगता है ... खवाबो के हिंडोले में ... चम्पे-चमेली-मोगरे की रस्सी पर .... हरी घांस के मखमली पट्टे पर झूलने लगता है ... झूलते झूलते जब बादल की परछाई सूरज की रौशनी को खुद में समेत लेती तो फिर दिल घबरा उठता अनजाने डर से ... बस स्टैंड पर अब सारी बसे भरी आने लगी थी , थकी हुई सी अपनी फाइल को हाथो में सम्हाले पर्स को काँधे पर सम्हाले ...... साडी का पल्लू  सम्हाल ... उसने  महिला की बात पर मुस्कुरा कर ....  जवाब दिया,  माफ़ कीजिये  ... मेरी रिस्ट वाच खराब है, ... आप  किसी और से पूछ लीजिये और हाँ में तमिल  नहीं हु ,.... और मुस्कुरा दी .... उसकी  मुस्कराहट ऐसी की ... आस पास खड़े खड़े सभी के चेहरे मुस्कराहट स्वाभावत: ही आ जाती ... जादुई व्यक्तित्व, पर बहोत ही साधारन, ....  बादल  अचानक से  लगे ,... छोटी छोटी बूंदे .. हलकी झड़ी ... उसने अपना पर्स  छठा निकाल .... बैचेन निगाहों से ... इधर उधर देखने लगी .. ज्यों हिरनी को किसी शिकारी की गंध आ गई हो ... आँखें न जाने क्यों बहोत झपकती थी ...    अजीब उहापोश में थी की अब क्या करे बरसात  हो चली थी, पैरो में पानी की लहरे टकराने लगी, न जाने क्यों पास-पोर्ट ऑफिस के सामने के बस स्टैंड पर पानी इतना क्यों जमा हो जाता है, थोड़ी ही बारिश में ..... अब उसको दर लगने लगा था , बिजलीयां कड-कडाने लगी, दिल के आसमान पर यादों ने अंगडाइयां लेना शुरू कर दिया ... खोई खोई सी वो एक दूकान के छज्जे के नीचे  जा कड़ी हुई, ....निगाहे फिर भी उसी एक दिशा में लगी थी ... क्या मालुम .... वो ... क्यों बस में नहीं चढ़ रही थी ... बारिश बहोत तेज ... और ... तेज ... और ... तेज होती चली गई ...  दूर से लाल सिटी बस आते देख उसका रुआंसा चेहरा ...  सुस्त हो गया ... पैर थक गए थे .... ठण्ड से कांप सी रही थी ... बस में चढ़ने से पहले भी पीछे मुद कर देखा दूर दूर तक बारिश की बौछारों के धुंधलके के सिवा कुछ नज़र न आ रहा था , रोड लाइट की पीली रौशनी में ... सावन की बरसात के पानी की लहरे जामिन पर इठला इठला कर शोर कर रही थी ...... बस रवाना हो गई ... उसने देखा ... बस के पीछे कोई ... सुपरमैन की तरह दौड़ रहा है ... भाग रहा है ... उसका पीछा कर रहा है .... कोई परछाई जानी पहचानी सी .... कोई आवाज़ दे रहा है ..... बस पूरी तरह से अपनी गति पकड़ चुकी थी ..... ......... वो परछाई बहोत दूर तक उसका पीछा करती रही ... उसकी यादो में .......... और उसकी बातों में ....   परछाईयाँ   ...... और ... यादें .... एक ही तो बात है .. है न .... .......... 
   

बुधवार, 26 जून 2013

अब और कितना यकीं करें शेख जी आपके तिलिस्मई वादों का .

'' भारतीय संस्कृति में मृत्यु के समय तो दुश्मन भी आ जाता है
 ... जन्मदिन मनाने ..   नानी के  घर नहीं चला जाता "  .
.. विपत्ति के  पल और उनका रुख-ए-मिजाज  ...

अब और कितना यकीं करें शेख जी 
आपके तिलिस्मई वादों का ..... 
जिंदगियां सम्हलती नहीं 
 लेकर सहारा रेत के दरकते किनारों का 
आजकल कूचा-ए-सियासत में 
है आना-ओ-जाना माना आपका  
इन्तिज़ार करती है टूटती साँसे 
किसी रहनुमा के आने का, हो सके गर 
ज़रा महसूस करके देखिये दर्द उस बदनसीब का 
लाशो से कफ़न उतार कर जो ढक रहा 
तन अपने अजीज का, 
था हर तरफ सैलाब-बे-आब आसमां  का 
एक एक बूँद को रहा तरस हलक हर एक का 
सदियाँ करेंगी गम लाशो के खो जाने का 
 और अनसुनी कर आपके यूँ ही 
महफ़िलये-कब्रिस्तान  छोड़ जाने का
आप ही कहिये अब और कितना यकीं करें शेख जी 
आपके तिलिस्मई वादों का ..... 

 

सोमवार, 24 जून 2013

15. Hi .....I am Rain.

 Hi .....I am Rain..

I am the daughter of vast-breast sea,
I rise from earth, grasp my form in heaven's paradise ,
dances accompanied with slowly blowing breeze,

Came on earth like dappled pearls,
enriched the fields, blooms-buds,

help the engraved seed to breath in open n sprout.,
flows freely breaking the hardest stones carving the path,

sometimes with anger destroys the obstacles, but
soon dejected passes through distant upland,

to meet my destiny again,
goes and rest in the lap of wast-breast sea again.
.... Oh! I intoduce myself..... I am familiar to you as RAIN.., I am Rain.....  


By      ANITA RATHI …..10.07.2012


रविवार, 23 जून 2013

Yadein - 9

यादें याद आती है .....  बातें बातें भूल जाती है ....

..... चांदनी यूँ ही जब आँगन में  आती है यादो  के सिलसिले निकल पड़ते  है गुजरते वक़्त का हाथ थामें और फिर चलने लगता है कोहरे की चादर ओढ़े यादों का काफिला ....  फार्म हाउस के लॉन में ... खुले आसमान के नीचे मछरदानी लगे बिस्तर दोनों और टेबल फैन ....  हवा भी छन कर आतीमोगरे और रात की रानी की मदहोश कर देने वाली अरोमा ... बाउंड्री वॉल के सहारे लाल और गुलाबी देशी गुलाबो की हेज ... संदल सी काया ... साँसों के नुपुर महके महके। नर्म मखमली घास का कालीनआसमान पर पूरा चाँदआधी कच्ची उम्र .... खुद ही में खोई खोई सी ..... काले घने गेन्सुओ से ढकी पीठकमर के घुमाव पर चलती पसीने की एक अनवरत बूँद .... बूँद की सर्रर्र सर्र्राहत .... दिल में बैचैनी ....सुरमई आँखों में ख्वाबो का सुरमा सजा लेती  और घंटो तारों को निहारती, चकोर सी एक टक चाँद को देखना बहोत भाता ....... और उसी  चांदनी में दूर थोड़ी दूर मैं लैंप की रौशनी में किताबो के ढेर से तुम्हे देखा करती ... पढ़ते पढ़ते ... नजरें मिली , तुमने भांप लिया था मुझे की में सिर्फ पन्ने पलट रही थी पढ़ तो तुम रही थी ..... मुझे और मैं तुम्हे , है न ... सोल्हा आने सच्ची बात ... कृष्ण और सुदामा की दोस्ती ... अभी जिंदा है , ...तुम्हारी यादें ....... 

Aameen

क्या लिखू .क्या  गाऊ ..... 
आरती गाऊ या दुखद कोई गीत सुनाऊ 
ग़ज़ल तो बह गई गंगा के संग 
जब बिछडा जोड़ा दर्द के संग 
मसखरी करू कैसे हज़ारो लाशो के संग 
नौटंकी लगती है अब पूजन की विधि 
तिलक लगा दू पहले फिर स्नान कराऊ 
भूल जाऊ  सारी विधियां ...
या फिर ....  
 उस फौजी को कृष्ण बना 
... मीरां सी खुद हो जाऊ ....
जिसने जानबूझ कर भी झोक रखा है खुद को 
नर सेवा में , पार उतार रहा सबको वो 
जो गए थे मिलने पालनहार को 
  तू ही बता अब में क्या गाऊ ......

शुक्रवार, 21 जून 2013

उत्तराखंड त्रासदी ......

सामजिक सरोकार . उत्तराखंड त्रासदी ......

 आदरनीय मित्रो 

उत्तराखंड - बदरीनाथ , केदारनाथ में प्रकृति ने जो तांडव मचाया, इस हादसे को देशवासी  नहीं भूल सकते। कई हजार लोगो ने अपने अपनों को  हँसते हँसते तीर्थ यात्रा भेज था और उम्मीद की थी की सब हंसी ख़ुशी लौट आयेंगे , हमेशा की तरह, मगर ... इस बार त्रिकाल को कुछ और ही लीला सूझी और उसने अपने भक्तो को अपना रौद्र रूप दिखा ही दिया। कई हज़ार लोग लापता और कई हज़ार लोग बे-वक़्त मौत के हवाले। इन मरने  वालो में ..... नौ-जवान सबसे जियादा है, फिर प्रौढ़ और यहाँ तक की छोटे छोटे मासूम बच्चे और दुध्मुहे बच्चे तक शामिल है।  हम इसके लिए समय को दोष दे, या प्रकृति को या कहे कुछ भक्त भगवान् को इतने भा गए की उन्होंने उनको हमेशा हमेशा के लिए अपने पास बुला लिया, मगर ......हकीकत .................  ??? हकीकत ये है की -------------

------मेट्रो की चाल चलता जीवन, रुपैये के ढेर पर सोता इंसान, नींद को तरसती कॉल सेंटर्स में कमर तोड़ म्हणत करते युवा ,  जिंदगी शहरी जीवनशैली , भौतिकतावादी संस्कृति और सबसे बड़ी बात मानव का अति-अपेक्षावादी होना। और इन सब का परिणाम तनाव,  ब्लड-प्रेशर,  घबराहट,  बेचैनी ,रिश्तो में तनाव और  तनाव को कम करने या भूलाने का एक --भूलने का एक  मात्र उपाय आमोद-प्रमोद , हिल स्टेशन की सैर। अब ऐसे में धर्म को एक अछि खासी commodity  बनाने वाला वो तबका जो स्वयम को धर्म का मसीहा दिखा कर बसे और ट्रेने तीर्थ यात्रा कम्पनी के नाम पर लोगो को लुभावने आकर्षण दे दे कर उकसाते है। और नीम हकीम खतरा ये जान , धर्म और धार्मिकता के मर्म को पूरी तरह समझे बगैर बोरिया बिस्तर ले चल देते है हिल स्टेशन के सैर सपाटे  cum  तीर्थ यात्रा के ठेकेदारों के पास। खुश  होते है प्रति नग खर्च कम में दस से पन्द्राह दिन के हनीमून पर। या फिर खुद की कार से लॉन्ग ड्राइव कम रोमान्स राइड पर। रास्ते में पीना पिलाना आम बात .....  ये यात्रा धार्मिक नहीं रह जाती .... ये ... ना मालूम क्या ही हो जाती है ........

मुझे जहां तक मालूम है हिन्दू धर्म ग्रंथो में मनुष्य जीवन को १ ० ०  वर्ष का मान उसे उम्र के अनुसार आश्रमों में बांटा गया है ताकि इंसान व्यवस्थित और दीर्घायु  के साथ साथ सुखी संपन्न जीवन यापन कर सके ... ये आश्रमों में एक है ...  संन्यास आश्रम  जो की आयु का वो  होता है  इंसान अपने सभी उत्तरदायित्वो से  हो  जाता है और स्वयम को इश-अराधना, ध्यान और साधना में लगा आध्यात्मिक सुख प्राप्त करता है 

और इसी क्रम में वह तीर्थ यात्राएं करता है , क्रोध , लोभ , मोह के जंजाल से जीवात्मा को मुक्त कर , परमात्मा के सानिध्य को पाने के उपक्रम में वो दिन रात सारे मोह ताज कर तीर्थो पर जाता है। परन्तु आज हम देख रहे है २ साल का बच्चा भी तीर्थ यात्रा गया था .... तो ... १ ६ साल की बालिका भी तीर्थ कर रही है,....... हाँ मजेदार बात ये है की बुजुर्गो की संख्या उतनी नहीं जितनी प्रोढ़ लोगो की है .... 

इस सब में धार्मिकता कम, अधार्मिकता अधिक दिखती है, अंधविश्वास और अज्ञान अधिक दिखता है ,  अन्धानुकरण साफ़ द्रष्टिगोचर होता है , हम समझ सकते है, किस मकसद से किस उम्र का इंसान ऐसी आस्था और विश्वास वाले स्थानों पर जाते है और वहाँ के प्राकृतिक सौहाद्र और वातावरण को नुक्सान भी पहुंचाते है। 
.
धर्म शास्त्रों में शिव का स्थान सबसे ऊपर है वो त्रिनेत्रधरी है, वो त्रिलोकी है वो अन्तर्यामी है , वो भोले है, लेकिन हम ये क्यों नहीं स्वीकारते वो एकांतवासी है , वो साधक है, उनकी साधना में तो स्वयं पार्वती (प्रकृति) भी बाधा उत्पन्न नहीं कर सकती थी और  करती थी तो अच्छा ख़ासा दंड भुगतना पड़ता था , तांडव से धरती डोल उठती है , तीनो लोक काँप उठते है। और इंसान अपनी हदें  भूल उनके एकांत को कोलाहल में परिवर्तित करता चला जा रहा है, ...... कोई सीमा ही नहीं रही , कोई बंधन ही नहीं रहे , कोई अंकुश ही नहीं ..... धन के दम पर क्या क्या खरीद लेना चाहता है ... चाह परिणाम सामने है 
...
उन्होंने बदरीनाथ के प्राचीन स्वरुप को एक बार वापस हमारे सम्मुख ला रखा है , केदारनाथ के मंदिर में बाबा भू-समाधि में है और बाकी बचा है तो एक नंदी, ........ और सब और वीरान .... सन्नाटा .......... 

क्यों नहीं हम सीख लेते इस हादसे से ....  हमें प्रण लेना होगा  ...... 

.   तीर्थ यात्रा अपने सभी उत्तरदायित्वो से मुक्त हो कर ही जाना है।
.   ६५ / ७ ० वर्ष अपना के व्यक्ति  को  स्वास्थ्य जांच करवा कर ही जाने दिया जाए 
     ( 65 /70  वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति  को  किसी विशेष परिस्थिति में ही ऐसी जगहों पर जाने दिया  
      जाए )
 .  धार्मिकता अपनाये ... मन, कर्म , और वचन से अन्धविश्वासो में नहीं।
.   सरकार इन स्थानों पर व्यावसायिकता को बैन करे।
५   दर्शन करने के बाद, वहां रुकने के लिए सिर्फ कुछ घंटो की इजाजत दे 
.  नियंत्रित यत यात व्यवस्था को अपनाये।  
७   बीमा कम्पनियों को दायित्व दे। 
8.  स्थानीय प्रशासन तीर्थ-स्थलों को पर्यटन या पिकनिक स्पोट न बनने दे 

देख तेरे संसार  की हालत क्या हो गई ... ईन्सान ..
कितना बदल गया भगवान् .......


 मेरी इस पोस्ट से किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंची हो तो मुझे अनजान समझ कर माफ़ करें। 

बुधवार, 19 जून 2013

मंजर-ए- जिंदगानी बालू की रेत पर एक कहानी


(38)
मंजर-ए- जिंदगानी 

बालू की रेत पर एक कहानी 
 कायनात ख़ुदा की मेहरबानी ... 

(39)
डरते है ऐसे आलम में जिंदगी तुझ से,
आरजुओ से मांगी इक दुआ हमने 
वो फकीरी--मुहब्बत में अहसान जता गए ........  

(40)
दिलो की ताबिश एक पल की 
 औकात धडकनों की हरकत साँसों की 
गुमान तख्तो-ताज का, खाख
खेला खेल सब उस एक ही का .....

(41)
इस इश्क की तासीर क्या कहने  ....
इक तस्वीर जो बसा आये निगाहों में 
क्या खबर थी दुनिया बस जाएगी 
एक निगाह--करम से, जो थी वीरान 
कभी वो बस्ती मेरे ख्वाबो की सवर जाएगी 
जन्नतो की खवाहिश किसे रहमतो की बरात में .....   आमीन 




मंगलवार, 18 जून 2013

yaadein - 8


यादें....yes... यादें कभी भी कहीं भी , फ़्लैश बेक में ..... कितना  जादुई आकर्षण था उस की आँखों में ...  पलके एक बार पलके   उठा के देख लेती तो हरसिंगार खिल उठते, दूर से उसकी काली लम्बी चोटी उसका  करवा देती,   जितने लोग आस पास के देखते फिर   देखते जब तक वो चली न जाती...  झिलमिलाती जिन्दगी की रौशनी थी, मुस्कुराहटो का मेक - अप करती थी बस, कुछ दिन  वर्किंग वीमेन हॉस्टल में, ... अपने अल्हड मद मस्त व्यवहार से  सबका मन जीत लिया था, शाम को पीने का ताजा पानी भरती,  गैस पर  टी - पैन रखा होता, पानी बह रहा होता ... हॉस्टल के किसी  और कमरे से ... अगर ..  खलनायक फिल्म का गाना ....आइटम सोंग ... ....   चुनरी के नीचे ... सुने दे जाता , वहीँ डांस शुरू कर देती, फिर चाय का भी धुआँ निकल जाता उसका डांस देख कर ... पानी का घड़ा छलक छलक जाता ....  हॉस्टल उसके साथ नाचने लगता .... दिन भर ऑफिस के काम की थकान तनाव सब  गायब हो जाता ... ऐसी थी वो सुना था ... सुप्रीति सेनगुप्ता,  शहर में नई  है  बंगाल के किसी गाँव से ..... अपने में मस्त रहती ... एक दो  महीने जाना नहीं हो पाया हॉस्टल ... एक दिन सुप्रीति को हॉस्टल के गेट पर खड़े देखा ..   पास ही सब्जी मंडी थी ... पापा के साथ सब्जी  लौट रही थी , मुच्छड़ चौकीदार के डर  से वो गेट से बाहार  नहीं आ सकी, लगा इतनी देर  गेट पर क्यों खड़ी है, .... पापा के डर से उस से बात नहीं की ...... अगले दिन हॉस्टल  जाने का सोच ही रही थी की ...   न्यूज़ पेपर की फ्रंट हेड  लाइन पर  नजर गई .... वर्किंग वीमेन हॉस्टल के  कमरे में युवती ने की आत्महत्या ...  सुसाइड नोट में लिखा .... मेरे गाँव का लड़का तुम जैसा पत्थर दिल नहीं हो सकता की जीवन साथी बनाने का वादा कर मुकर जाये वो भी साथी और खुद के बच्चे दोनों से ...... सुप्रीति।  मैं तो  सकते में पड़ गई और फिर ... फिर क्या , उसे क्या हुआ था , .... शहर के लोगो का छूत के रोग से वो  बुरी तरह  घायल  हो  गई  थी ..
.  शहर के रोग ...  ये ... शहर के लोग पता नहीं कब लगा देते है .... बहोत दुखदाई होते है, शहरों के लोग ... और ... शहरों के रोग  दोनों ...........

सोमवार, 17 जून 2013

सीख लो पूरब वालो एक दिन ये गंगा जड़-शास्वत को भी बहा ले जाएगी।

हर तरफ  हा हा कार है, 
प्रकृति ने दिखाया ऐसा रूप है 
वासना के सुख की खातिर 
इंसान ने गंवाया सुख-चैन है 
एक बार नहीं कई  सौ बार दोहराया है 
ना मालूम क्यों इंसान के समझ ना आया है 
माँ, बहन, बेटी  हो या हो अर्धांगिनी 
 है नारी  जीवन पथ की संगिनी 
 तक था भ्रम तुम्हे तारण-हार होने का 
गंगा  सर पर धारण हार होने का
शिव होने का, शास्वत होने का 
गर्व सब धूमिल सा हुआ सर्वशक्तिमान होने का 
न समझाओ मुझे की वो तो मिटटी की  थी 
अस्सी साल की बूढी थी, ..... तो क्या 
ये हाड मॉस का पुतला पञ्च तत्व का नहीं 
तो क्या ये मिटटी ना होगा, तो क्या ...
ये अस्सी साल का न होगा ..... 
.... तो धारित गंगा क्या  अपना रोद्र 
रूप न दिखाएगी .............  सीख लो पूरब वालो 
एक दिन ये गंगा जड़-शास्वत को भी बहा ले जाएगी।

मैं, तो यु ही कायल हु तेरे नाम का तू मिलने की जद्दो जहद तो ना कर


तरकश में तेरी अदायगी भर ले 
शब्दों के ये नश्तर ना चला 

मैं, तो यु ही कायल हु तेरे नाम का 
तू मिलने की जद्दो जहद तो ना कर 

ज़रूरी नहीं की बदनाम हो इश्क में 
आइना भी जुबान रखता है 

ज़माने की फ़िक्र  नहीं, मुझे यु खुद 
को खुद से बदनाम तो न कर ....

ये खयालो की बस्ती है आओ राख करो अब इसको


आ, की बैठ कुछ पल आराम से 
थक गए हो तुम मेरे खयालो से 

ना परेशान तुम करो खुद को ..
जाम जो उठा लिया है तो 

ना बर्बाद करो खुद को ये खयालो 
की बस्ती है आओ राख करो अब इसको 

चलो तुमको इज़ाज़त है की तुम भूल जाओ मुझे ..... आमीन


ज़माना क्यों गरीब कहता है हमें 
हजारो गम की दौलतें है मेरे खजाने में 

कोई सौगातें न दो तुम आज 
इतना कह दो नहीं भूले दिल से कभी 
 
यूँ भी जिया  जा सकता  है  की उदासियों में सहर हो 
चलो तुमको इज़ाज़त है की तुम भूल जाओ मुझे ..... आमीन 

रविवार, 16 जून 2013

TO THE GLORY OF EVENING



I adore the blush of every eve ...
That gleams with pinkish hue
When sparks over the lush green highland
It decorates the Cristal dew ........ 

It's then I muse on holy nymph's smile
That lovely bright and fair,
My Sorrows always Can entice
And  I adore each dormant care.

I adore each pensive spark into deep heart bay
That lonely twinkling  lightening cheers,
When shining so bright at the end of the day
Everything shines so clear, through evening’s tears.

It’s then, I found reminiscence smoothly says
While beats my bosom stir, and
Such is Thy Tender gaze at me
And such her glimpse of glory showers at me.