शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

विभाजनकारी सोच : भारत के लिए चुनौती 




"इतने बड़े मुल्क को एक रखना बड़ी चुनौती रही है और कांग्रेस ने मुल्क को हमेशा अखंड रखा "कांग्रेस घोषणा पत्र जरी करने के बाद एक प्रेस वार्ता में श्री अशोक गहलोत ने ये वक्तव्य कहा जिसे नाकारा नहीं जा सकता। हम सब जानते है भारत अनेकता में एकता वाला देश हैविभिन धर्मो,जातियोंभाषाबोलियों और अनेको अनेक सामजिकसांस्कृतिक विभिदताओ वाले देश को एकता के सूत्र में बांधे रखना कोई मामूली बात नहीं।

अगर बदलते राजनैतिक परिवेश कि बात करें तो इक्कीसवी सदी में विभाजन के नए नए स्वरुप देखने को रहे है ऐसे में देश आगे बढ़ेगा या १०० साल पीछे जायेगा ये तो वो ही बता सकता है जिसने इस दम्भ को महसूस किया है। कुछ वर्षो पहले हिन्दू -मुस्लिम को अलग कर राजनीती करने का जो गन्दा रिवाज चलाया गया वो अपने चरम पर अब नए आयाम ले चुका हैदेखने में आता है कि अब हिन्दु-मुस्लिम-सिख-ईसाई को भी सब-डिवीजनस में बांटने कि कवायद जोरो पर है। राजनीति के गलियारो में जहां सदियों से आज तक डिवाइड एंड रूल का जुमला पढ़ा जाता रहा है। वही सरकार बनाने के लिए भी इसे एक हथियार के रूप में खूब आजमाया जाता रहा है। २१ वि सदी के भारत कि अगर बात करें तो पहले जातीधर्मभाषा और क्षेत्रीयता के नाम पर वोट कि राजनीति देखने में आती थी। परन्तु वैश्वीकरण के सारे समीकरणों को धता बताते हुए देश में स्थिति और भी गम्भीर हो चली है। आज हम अगर सजग हो अपने आस पास देखे तो कुछ ऐसे सामाजिक समूह उभर कर आ रहे है जिनका अस्तित्व पहले सामजिक सरोकार तक सिमित होता है फिर ये छोटे छोटे समूह सामजिक सांस्कृतिक गतिविधियों कि परिलब्धियों को दर्शाने एवं स्वयं के अस्तित्व को समाज के नक़्शे पर उजागर करने के तुच्छ उद्देश्य से किसी न किसी पार्टी से स्वयं को जोड़ लेते है। ये प्रक्रिया एक तरफ़ नहीं होती ये प्रक्रिया पूर्ण रूप से सोचा समझा एक सामूहिक प्रयास होता है जिसका जन्म ही पार्टी के लिए आने वाले राजनैतिक घटनाक्रम में बहुमत से उभर कर आना और पार्टी को शक्ति प्रदान करना होता है। मजे कि बात तो ये है कि हम आम जनता इस पूरी एक नौटंकी के सजग हिस्सेदार होते है और फिर भी अंधे होते है।

भारतीय राजनीति में व्यक्तिकरण कि राजनीतिबढ़ रही है। अब व्यक्ति विशेष को जाना जाता हैउसके व्यक्तित्व का प्रभाव और उसकी छवि पार्टी विशेष के के लिए सत्ता में आने का माध्यम बना है। अब पार्टी को वोट नहीं जाते है अब व्यक्ति विशेष को वोट दिए जाते है। ये व्यक्ति एक वृहद् समाज के लघु सामाजिक समूह का सशक्त (आर्थिकसामाजिक तथा व्यवहारिक शक्तिव्यक्ति विशेष होता है जिसकी आवाज समाज से उस समाज या समूह के लोग जुड़े होते है। ऐसे में श्री अशोक गहलोत का ये वक्तव्य उनकी पार्टी के प्रति सच्ची निष्ठां और देश के लिए सामूहिकता एकजुटता कि भावना को दर्शाती है। देखा जाये तो राजस्थान में राजनीति का गणित अभी भी गणतंत्र के मापदंडो के अनुरूप ही रहा है,कर्मठता और कर्मशील को अपनाया जाता रहा है। धर्म जाती या क्षेत्रीयता का बोलबाला न के बराबर था। परन्तु जब से भाजपा का कार्यकाल आया और एक बड़ा ही बुरा अनुभव राजस्थान कि आम जनता को करना पड़ा। तब से ये महसूस किया और फिर गहलोत सरकार ने प्रदेश कि जनता को जिस अपनेपन और विकासवादी दूरदृष्टि का परिचय दिया तो साफ़ साफ़ नज़र आने लगा कि ताली एक हाथ से नहीं बज सकती। प्रदेशवाद कि कवायद न करते हुए मैं इतना ही कहूँगी कि दोनों ही पार्टी नेताओ कि मंशा अब लोगो के सामने साफ़ है कि किसको प्रदेश के विकास से सरोकार है और कौन प्रदेश से फ़ायदा उठा लेने कि मानसिकता लेकर राजस्थान कि राजनीति में आया। देश में हिन्दू-जैन समाज के वोट किसको जायेंगे हिन्दूअग्रवाल समाज के वोट किस पार्टी को जायेंगे हिन्दू-कायस्थ समाज के वोटहिन्दूजाट समाज के वोटहिन्दू मीना समाज के वोट या फिर हिन्दू गुर्जर समाज के वोट इसी प्रकार न जाने कितने ही और बंटवारे एक ही धर्मं या जाती के नहीं बल्कि जातियों और धर्मो को अब इस तरह से भी बाँट कर देखा जा रहा है। इक्कीसवीं सदी में भारत में विभिन्न राजनैतिक दलों के साथ साथ अब मतदाताओ को भी इसी तरह बाँट लेने कि मानसिकता साफ़ दिखाई दे रही है। परन्तु ये भारत के भविष्य के लिए कोई अच्छे संकेत नहीं है। होना ये चाहिए था कि सबको एक सूत्र में बाँधा जाये और एकता कि भावना को हमेशा मद्देनजर रखा जाये न कि समाज के ताने बाने कि बखिया को उधेड़ उनको वापस कपास कर दिया जाये .... धुनि हुई कपास कभी भी आग पकड़ लेती ह कमजोर होती है वो मजबूती नहीं रह जातीफिर इस प्रकार के बंटवारे क्या ये देश के लिए खतरे कि घंटी नहीं है ...? ऐसे में जरूरत है तो ऐसे नेता के चयन कि जिसका मंतव्य जाती या वर्ग विशेष को लाभ पहुँचाना न हो बल्कि प्रदेश हित और देश हित कि भावना हो

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