सोमवार, 12 सितंबर 2022

हवाओ के नाम

 भास्कर आसमान का हूँ 

और धरा का मान हु मैं . .......

इन् हवाओं में है खुशबुए हिना 

क्षितिज आज लगे ज्यू रंग-ए-हिना 

तारों की पालकी में बैठी सुबहा की दुल्हन 

निकली यादो की बरात से जगमग 

उसको भी रहता इन्तिज़ार सदियों 

सदियों, वो एक जो है तुमसा .....

तुम्हारे नूर सा रोशन वो एक 

जो खुश है सबको खुश देख 

है अस्तित्व उसका इस धरा की 

धारिणी से, दे रहा निरंतर 

खुशनुमा मौसमो की सौगाते 

कर रहा ऐलान हर और जागते 

रहो, करो युग निर्माण, हाँ 

इंसान हो, तुम में हु मैं , मुझ से 

तुम, नहीं थकता चाहे हो कितने 

बवंडर या की काली-पीली आंधियां 

दिखाए कितने ही रूप आग उगलता 

ज्वालामुखी, है नहीं मेरे अस्तित्व से 

बढ़कर, है सूत-समंदर कितने ऐसे 

मुझ में समाये, जब जब हो ... 

जाता है गुस्से का कहर .... हो जाते 

फल सारे कसैले, लेकिन जब 

जाती है कोहरे की चादर समेटे 

सर्द रातों की नर्म गजक सी 

एक दुल्हन मौसमो की ....

लद जाता अंचल धरा का  

फलो  की मिठास से 

हाँ सच ...  कलियों के चटकने से

महक उठते जंगल, खेत, पहाड़ 

और ...कौना-कौना .... और हाँ

वो एक विरहनी करती इन्तिज़ार

बेसुध लपेटे आँचल सतरंगी सा 

नारंगी रंग से लथपथ ... खेली है 

उस संग होली मैंने जनम जनम 

हर दिन .... हर शाम ... वो मिलती 

मुझ से उतनी ही शिद्दत से 

करती इन्तिज़ार हर दिन सांझ ढले 

नहीं नहीं .... सात फेरे नहीं .... मैं 

लेता हूँ उस प्रेयसी के हर पल फेरे 

करता हु प्रेम-आलिंगन और फिर 

जाना होता है उसके इन्तिज़ार 

भरे नयनो से थोडा दूर ....

क्षितिज के उस पार 

ताकि कर सके उसके अपने 

अपने सपनो का कोलाहल शांत 

बुन ले अपने युग के खिलोने 

खेल ले मानव मेरा बच्चा ...

में शापित हु अपने बच्चे के 

शव को ढोने का ....... किन्तु

पिता हूँ सब को पलता हु 

चलता हु अनवरत ... हाँ 

भास्कर आसमान का हूँ 

और धरा का मान हु मैं . 

 @Anita 'RaahiRaaj'

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