मुश्किल बहोत है इन्तिज़ार की खाई को पाटना, न ये कहना की रुको मत जाओ , न ये सह पाना की तुम्हारा जाना .. ना मालूम अजीब सा इन्तिज़ार दे जाता है, क्यों कोई किसी को इतना याद आ आ कर परेशां कर जाता है की .... की .... ..... कुछ कहा जा सकता , मुश्किल है बहोत मुश्किल है ये समझ पाना की किसी को किसी की कितनी याद आती है या आ रही है ... जब लगे उस की तरफ वाले रास्ते पर चलना शुरू कर दिया जाये , शायद इन्तिज़ार की घड़ियाँ काटने का सबसे अच्छा तरीका है फिर लगता है ... क्यों किस बात की बैचैनी है ... टिकी है घडी की सुइयां अपनी धुरी पर .... चल रहा है समय ... समय या काम , काम और समय , इन दो शब्दों ने बाँध लिया हो जैसे , जिंदगी की डोर को और फिर कह दिया जाओ अब तुम आजाद हो ,... जो जी आये करो ... कितने बिस्मिल है जो जी पाए अपनी खुदी से , ... बहोत से घायल है ... मयखानों से पूछो तो ... नहीं बता पायेगा मयकदा ... की कल कितने थे .. और जो घायल थे वो कितने घायल थे ... इक पल को समय से दूर ... नहीं हो सकते जबकि पता है ... घडी का आविष्कार ... सरे फसाद की जड़ है .... टाइम से बंध कर ... सारे बंधन भूल गए ... लेकिन ये बंधन समय और सीमा ... दम घोंट देता है कितने नवांकुर अरमानो का , ... जवान उम्मीदों का ... घुट के रह जाती है साँसो का उड़ता धुँआ .... तब .. सिर्फ यादें .. हाँ यादें जब याद आती है ... बातें ... बातों का क्या ... बातें भूल जाती है ..........
रविवार, 8 सितंबर 2013
यादें .... याद आती है ... बातें .... बातें भूल जाती है ..
मुश्किल बहोत है इन्तिज़ार की खाई को पाटना, न ये कहना की रुको मत जाओ , न ये सह पाना की तुम्हारा जाना .. ना मालूम अजीब सा इन्तिज़ार दे जाता है, क्यों कोई किसी को इतना याद आ आ कर परेशां कर जाता है की .... की .... ..... कुछ कहा जा सकता , मुश्किल है बहोत मुश्किल है ये समझ पाना की किसी को किसी की कितनी याद आती है या आ रही है ... जब लगे उस की तरफ वाले रास्ते पर चलना शुरू कर दिया जाये , शायद इन्तिज़ार की घड़ियाँ काटने का सबसे अच्छा तरीका है फिर लगता है ... क्यों किस बात की बैचैनी है ... टिकी है घडी की सुइयां अपनी धुरी पर .... चल रहा है समय ... समय या काम , काम और समय , इन दो शब्दों ने बाँध लिया हो जैसे , जिंदगी की डोर को और फिर कह दिया जाओ अब तुम आजाद हो ,... जो जी आये करो ... कितने बिस्मिल है जो जी पाए अपनी खुदी से , ... बहोत से घायल है ... मयखानों से पूछो तो ... नहीं बता पायेगा मयकदा ... की कल कितने थे .. और जो घायल थे वो कितने घायल थे ... इक पल को समय से दूर ... नहीं हो सकते जबकि पता है ... घडी का आविष्कार ... सरे फसाद की जड़ है .... टाइम से बंध कर ... सारे बंधन भूल गए ... लेकिन ये बंधन समय और सीमा ... दम घोंट देता है कितने नवांकुर अरमानो का , ... जवान उम्मीदों का ... घुट के रह जाती है साँसो का उड़ता धुँआ .... तब .. सिर्फ यादें .. हाँ यादें जब याद आती है ... बातें ... बातों का क्या ... बातें भूल जाती है ..........
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good anita ji
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