गुरुवार, 8 अगस्त 2013

हमारा प्रदेश - हमारी संस्कृति

हमारा प्रदेश - हमारी संस्कृति

PART : 6   : जयपुर- राजस्थान 
जयगढ़ दुर्ग : जयपुर की शान


 एक गणना के अनुसार राजस्थान में 250 से अधिक दुर्ग व गढ़ हैं। खास बात यह कि सभी किले और गढ़ अपने आप में अद्भुत और विलक्षण हैं। दुर्ग निर्माण में राजस्थान की स्थापत्य कला का उत्कर्ष देखा जा सकता है।  राजस्थान में दुर्ग निर्माण की परम्परा पूर्व मध्यकाल से ही देखने को मिलती है। र्गों के निर्माण में राजस्थान ने भारतीय दुर्गकला की परंपरा का निर्वाह किया है। निर्माण कला की दृष्टि से दुर्गों को अलग-अलग वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। अर्थात अलग-अलग उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण होता है। इन विभिन्न प्रकार के दुर्गों का उल्लेख करते हुए कौटिल्य ने छ: प्रकार के दुर्ग बताए है। उसने कहा है कि राजा को चाहिए कि वह अपने राज्य की सीमाओं पर युद्ध की दृष्टि से दुर्गों का निर्माण करे। राज्य की रक्षा के लिए "औदिक दुर्गों" (पानी के मध्य स्थित दुर्ग अथवा चारों ओर जल युक्त नहर के मध्य स्थित दुर्ग) व पर्वत दुर्ग अथवा गिरि दुर्गों (जो किसी पहाड़ी पर स्थित हो) का निर्माण किया जाय। आपातकालीन स्थिति में शरण लेने हेतु "धन्वन दुर्गों" (रेगिस्थान में निर्मित दुर्ग) तथा वन दुर्गों (वन्य प्रदेश में स्थित) का निर्माण किया जाय। इसी प्रकार मनुस्मृति तथा मार्कण्डेय पुराण में भी दुर्गों के प्राय: इन्हीं प्रकारों की चर्चा की गई है। राजस्थान के शासकों एवं सामंतो ने इसी दुर्ग परंपरा का निर्वाह किया है। यहाँ शायद ही कोई जनपद होजहाँ कोई दुर्ग या गढ़ न हो। इन दुर्गों का अपना इतिहास है। सुदृढ़ प्राचीरअभेद्य बुर्जेंकिले के चारों तरफ़ गहरी खाई या परिखागुप्त प्रवेश द्वार तथा सुरंग,किले के भीतर सिलह रवाना (शस्त्रागार)जलाशय अथवा पानी के टांकेराजप्रासाद तथा सैनिकों के आवास गृह-यहाँ के प्रायः सभी किलों में विद्यमान है। 

'जयपुर' दुनिया के सबसे खूबसूरत ऐतिहासिक शहरों में शुमार किए जाने वाला यह शहर तीन ओर से पहाड़ियों से घिर है। उत्तर में नाहरगढ की पहाड़ियां और पूर्व से लेकर दक्षिण में आमागढ़ की पहाड़ियों का विस्तार है। जयपुर में पहाड़ की शिखा पर बना सबसे खूबसूरत किला नाहरगढ़ दुर्ग है। यह पूरे जयपुर शहर से दिखाई देता है। नाहरगढ से ही उत्तर में इसी पहाड़ के दूसरे छोर पर जयगढ़ किला स्थित है। 

जयगढ़ किले को विजय किले के रूप में जाना जाता है। यह जयपुर के विख्‍यात पर्यटन स्‍थलों में से एक है जो अरावली की पहाड़ियों पर चीलटिब्बा ( ईगल्‍स के हिलपर अम्‍बेर किले  से 400 फुट की ऊंचाई पर स्थित है।इस किले से जयपुर के चारों ओर नजर रखी जा सकती थी इस किले के दो प्रवेश द्वार है जिन्‍हे दूंगर दरवाजा और अवानी दरवाजा कहा जाता है जो क्रमश: दक्षिण और पूर्व दिशाओं पर बने हुए है।यह दुर्ग आमेर शहर की सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए ---- में महाराजा जयसिंह जी द्वितीय ने बनवाया था। बाद में उन्हीं के नाम पर इस किले का नामजयगढ़ पड़ा। मराठों पर विजय के कारण भी यह किला जय के प्रतीक के रूप में बनाया गया। यहां लक्ष्मीविलासललितमंदिरविलास मंदिर और आराम मंदिर आदि सभी राजपरिवार के लोगों के लिए अवकाश का समय बिताने के बेहतरीन स्थल थे। यह किला जयपुर शहर से १५ किमी . की दूरी पर स्थित है  यह आमेर रोड पर स्थित है आमेर रोड पर जल महल के सामने से होते हुए आमेर घटी में एक मार्ग नाहरगढ़ की पहाड़ियों की  जाता है यहीं से एक रास्ता नाहरगढ़ के लिए निकलता है तो दूसरा रास्ता जयगढ़ दुर्ग के लिए। पहाड़ियों के निचले पायदानों में विश्वप्रसिद्ध आमेर महल भी स्थित है।

ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि अकबर के दरबार में सेनापति जयपुर के राजा मानसिंह (प्रथम) ने मुगल शहंशाह के आदेश पर अफगानिस्तान पर हमला किया था. इस इलाके को जीतने के बाद राजा मानसिंह को काफी धन-दौलत मिली, लेकिन उन्होंने इसे दिल्ली दरबार में सौंपने के बजाय अपने पास ही रख लिया. इस घटना के बाद से ये चर्चाएं चलती रहीं कि राजघराने ने यह संपत्ति गुप्त स्थानों पर छिपाकर रखी है. जयगढ़ किले के निर्माण के बाद कहा जाने लगा कि इसमें पानी के संरक्षण के लिए बनी विशालकाय टंकियों में सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात छिपा कर रखे गए हैं.  मानव की विकास यात्रा में कला का प्रवेश मनुष्य के मन में तब हुआजब उसकी प्राथमिक आवश्यकताएँ पूरी हो गईं।

 कला विहीन मनुष्य मशीन है। कला के संग संवेदनाएँ जुड़ी हुई हैं। कला मनुष्य में स्पन्दन का बीजारोपण करती है। कला मन को झंकृत करती है। सभ्यता के विकास के साथ संस्कृति समृद्ध होती चली गई। संस्कृति की अभिव्यक्ति मनुष्य ने विभिन्न रूपों में की।  मध्ययुगीन भारत की प्रमुख सैनिक इमारतों में से एक जयगढ़ दुर्ग की खास बात यह कि इसमें तोपें ढालने का विशाल कारखाना थाजो शायद ही किसी अन्य भारतीय दुर्ग में रहा है। 

‘जयबाण’ तोप को एशिया की सबसे बड़ी तोप :
इस किले में रखी ‘जयबाण’ तोप को एशिया की सबसे बड़ी तोप माना जाता है।  लगभग पचास टन भारी और सवा छह मीटर लम्बाई की इस विशेष तोप को यहीं दुर्ग परिसर में ही निर्मित किया गया था। तोप 50 किमी तक की दूरी पर निशाना साध सकती थी।जयगढ़ अपने विशाल पानी के टांकों के लिये भी जाना जाता है। जल संग्रहण की खास तकनीक के अन्तर्गत जयगढ़ किले के चारों ओर पहाड़ियों पर बनी पक्की नालियों से बरसात का पानी इन टांकों में एकत्र होता रहा है।  इस किले का निर्माण एवं विस्तार में विभिन्न कछवाहा शासकों का योगदान रहा हैपरन्तु इसे वर्तमान स्वरूप सवाई जयसिंह ने प्रदान किया।  वर्तमान में जयगढ़ किले में मध्यकालीन शस्त्रास्त्रों का विशाल संग्रहालय है। यहाँ के महल दर्शनीय हैं। जयगढ़ को रहस्यमय दुर्ग भी कहा जाता है,क्योंकि इसमें कई गुप्त सुरंगे हैं। इसमें सबसे खास था आमेर महल से जयगढ़ जाने वाली सुरंग | इस सुरंग का भी ऐतिहासिक महत्व है। यह सुरंग एक गोपनीय रास्ता थी जिसका इस्तेमाल राजपरिवार के लोग एवं विश्वस्त कर्मचारी जयगढ़ तक पहुंचने में किया करते थे। 

ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक आमेर रियासत को सबसे ज्यादा खतरा मराठों से था। इसीलिए आमेर की सुरक्षा के लिए तीन तीन दुर्गों का निर्माण किया गया। राजपरिवार को संभावित खतरे से बचाने के लिए जयगढ़ तक यह सुरंग बनाई गई। इस किले में राजनीतिक बन्दी रखे जाते थे। ऐसा माना जाता है कि मानसिंह ने यहाँ सुरक्षा के निमित्त यहाँ अपना खजाना छिपाया था। वर्तमान में जयगढ़ किले में मध्यकालीन शस्त्रास्त्रों का विशाल संग्रहालय है। यहाँ के महल दर्शनीय हैं। हाल ही यूनेस्को की एक टीम ने आमेर महल का दौरा किया। आमेर महल को विश्व विरासत सूची में शामिल करने से पूर्व नियमों की कसौटी पर इसे परखा गया। इस विजिट से पूर्व आमेर महल के इतिहासिक पक्षों का नवीनीकरण किया गया।

 आमेर महल से जयगढ़ जाने वाली सुरंग :
 इसमें सबसे खास था आमेर महल से जयगढ़ जाने वाली सुरंग का तलाश कर फिर से गमन करने योग्य बनाना।  जयगढ़ किले में खजाने की बात देश को आजादी मिलने के बाद भी गाहे-बगाहे चर्चा में आती रही |विश्वस्त सूत्रों से पता चलता है की इस वक्त जयपुर राजघराने के प्रतिनिधि राजा सवाई मान सिंह (द्वितीय) और उनकी पत्नी गायत्री देवी थे. 'स्वतंत्र पार्टी' के सदस्य ये दोनों लोग कांग्रेस के धुर विरोधी थे. गायत्री देवी तीन बार जयपुर से कांग्रेस के प्रत्याशी को हराकर लोकसभा सदस्य भी बनीं. इस दौरान राजघराने के कांग्रेस पार्टी से संबंध काफी खराब हो गए| 1975 में जब देश में आपातकाल लगा तब गायत्री देवी ने इसका मुखर विरोध किया और कहा जाता है कि इंदिरा गांधी सरकार ने इस वजह से आयकर विभाग को राजघराने की संपत्ति की जांच के आदेश दे दिए. 1976 में सरकार की इस कार्रवाई में सेना की एक टुकड़ी भी शामिल थी. इसे जयगढ़ किले में खजाना खोजने की जिम्मेदारी सौंपी गई. उस समय सेना ने तीन महीने तक जयगढ़ किले और उसके आस-पास खोजी अभियान चलाया. लेकिन खोजी अभियान समाप्त होने के बाद सरकार ने औपचारिक रूप से बताया कि किले से किसी तरह की संपत्ति नहीं मिली.हालांकि बाद में सेना के भारी वाहनों को दिल्ली पहुंचाने के लिए जब दिल्ली-जयपुर राजमार्ग तीन दिन के लिए बंद किया गया तो यह चर्चा जोरों से चल पड़ी कि सेना के वाहनों में राजघराने की संपत्ति है. लेकिन बाद में इस बात की कभी पुष्टि नहीं हो पाई और अभी तक यह बात एक रहस्य ही है |

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