-
राजस्थान
म्हारो राजस्थान -
राजस्थान की माटी की सुगंध, धोरो की धरती की तपिश, चांदनी रात में खिल चाँद का नूर, उगते सूरज सा रोशन चेहरा राजस्थान का, राजस्थान के लोगो के रंग बिरंगे चटकीले खुशनुमा रंगों के कपडे, हर हाल में खुश रहने वाले साधारण दिल ओ दिमाग के धनी अपने पन से भरे हिरदय , कोई लाग लपेट नहीं , किसी का दिल नहीं दुखते मेरे राजस्थान के लोग : दुनिया के नक़्शे पर अपनी अलग पहचान बने है अपनी मेहनत से। इसका हिरदय है --- जयपुर -- गुलाबी नगरी - पहले अजमेर। पधारो म्हारे देश ... अतिथि देवो भाव के भाव से लवरेज हर एक का ह्रदय .....
यह
एक ऐसी रचना है जो राजस्थान
की सांस्कृतिक धरोहर से आपको
अवगत करवाती है साथ ही साथ
आपको वहाँ नगर प्रासादों के
सुंदर इतिहास का संक्षिप्त
वर्णन भी प्रस्तुत करती है।
यह स्तम्भ अपने आप में अनूठा
स्तम्भ है। इस कड़ी में बहोत
ही कम अध्यन हुए है,
वैसे
हर शहर की अपनी कहानी होती है
परन्तु वह अच्छे कहानीकार के
अभाव में अधूरी सी ही रह जाती
है। इस कड़ी में हम आपको राजस्थान
के राजसी ठाठ-बाट
,
गली-कूचो,
हुनरमंदो
और दस्तकारो का बखान प्रस्तुत
कर रहे है प्रस्तुत है इसी कड़ी
में एक बेजोड़ कहानी राजस्थान
की राजधानी कहे जाने वाले
गुलाबी शहर -
जयपुर
की। मेरे इस लेख से अगर
आपको जयपुर का चित्रण ,
वर्णन
साक्षात होता है तो मैं अपने
को धन्य मानूगी।
भारत का
पेरिस कहलाने वाला शहर जयपुर,
1727 ई
.
में
पौष क्रिशन 1
संवत
1784
वि
.
में
इसकी नींव रखी गई। जयपुर
शहर विश्वभर में अपनी एक अलग
पहचान रखता है। करीब अढाईसौ
बरस पहले आमेर के महाराजा सवाई
जयसिंह ने इसका सपना देखा था
और उसी के अनुसार इस शहर को
बसाया,
महाराजा
सवाई जयसिंह के नाम पर इसका
नाम जयपुर रखा गया। इस शहर
के अलग अलग मुकाम ,
चौकड़ियाँ
,
चौपडो,
बाजारों,
कत्लो
,
बाग़-
बागीचों
की छठा देखते ही बनती है।
राजमहलो,
जनानी-ड्योधियों,
के
रावल,
राजमंदिर,
कारखानों
की अपनी कहानी और महत्त्व है।
वातु कला की विधा पर निर्मित
जयपुर शहर की गलियों,
मुहल्लों,
रास्तो
के नाम मशहूर हुए उनमें रहने
वाले के हुनर,
काम
और राजशाही के ओहदों से। कुल
मिला कर गज़ब सलीके से बसाया
जयपुर शहर,
बड़े
बड़े इंजीनियरों को आज भी दांतों
तले ऊँगली दबाने को मजबूर कर
देता है स्थापत्य का बेजोड़
नमूना हवा महल विश्व के साथ
आश्चर्यों में से एक है। शहर
जयपुर,
लम्बी
चौड़ी और ऊँची प्राचीर से घिरे
इस नगर में प्रवेश करते है,
.... अरावली
की सुंदर पर्वतमाला से ...
शहर
को अपनी असीम सुंदर वरमाला
से बांधे अरावली पर्वतमाला
मानो इसका गहना हो। खेरुज चुने
से बना गुलाबी रंग से रंगे चारदीवारी
क्षेत्र के शिखारांत मंदिर
और झुके झरोखों ,
जालीदार
छज्जो वाले प्रासाद।
चारो
कोनो पूर्व,
पश्चिम,
उत्तर,
दक्षिण
में चार प्रवेश द्वार,
सुरजपोल,
अजमेरी
गेट,
चाँद
पोल ,
जोरावर
सिंह गेट जिनकी भव्यता देखते
ही बनती है,
अनेक
पुराने रीती रिवाजो पारंपरिक
जीवन शैली के साथ जयपुर एकदम
आधुनिक शहर है। मुख्या शहर
परकोटे के भीतर,
अपनी
गुलाबी आभा बिखेरता,
मोर
मुकुट से कंगूरों से सजे छज्जे
छते,
बरामदे
अपने आप में अनोखे राज शाही
रहन सहन को दर्शाते है। छोटी
चौपड,
बड़ी
चोपड के चारो और सूत बाँध कर
बने दुकाने,
मुख्य
बाजार है। जल निकास की उत्तम
व्यवस्था ,
आयताकार
भूखंड पर बसा यह शहर ,
इस
शहर को कुबेर की नौ निदियों
के प्रतीक स्वरुप बनाया गया
है जयसिंह जी ने इसको
पीले रंग से पुतवाया था परन्तु
राम् सिंह जी ने इसे गुलाबी
पुतवाया महाराजा राम सिंह जी
ने ही जयपुर को आधुनिक स्वरुप
देने की पहल की। शहर के मध्य
में राम निवास बाग़,
शहर
को विस्तार देने के राम बाग़
पैलेस ,
पोलो
खेलने के शोकीन महाराजा ने
पोलो ग्राउंड की स्थापना की
जो आज भी विश्व विख्यात है।
अल्बर्ट हाल म्यूजियम शहर की
शान,
रविन्द्र
मंच नाट्य कला को विस्तृता
देते है। महाराजा कॉलेज,
महारानी
कॉलेज,
सवाई
मान सिंह अस्पताल ,
मेडिकल
कॉलेज,
महारानी
गायत्री देवी गर्ल्स भगवान्
दास बराच (
आज
का सचिवालय,
सरकार
राजस्थान )
मिर्ज़ा
इस्माइल रोड शहर को एक कोने
से दुसरे कोने से जोडती पर्यटकों
का मुख्या आकर्षण है। महलो
में ...
जय
निवास,
शहर
के बिलकुल मध्य में स्थित है,
महलो
में .1775
ई
.
में
बना जय निवास,
शहर
के बिलकुल मध्य में स्थित है।
इसके उत्तर में ताल कटोरा और
राजा मॉल का तालाब थे जिनमें
तब मगरमछ भी होते थे। उत्तार
की पहाड़ी पर गढ़ गणेश है,
साथ
ही अपनी भव्यता सौन्दर्य और
बेजोड़ कारीगरी का विशालतम गढ़
नाहरगढ़ का किला स्थित है,
वहीँ
से जय गढ़ के किले का रास्ता
जाता है जो आज होलीवूड ,
बोलीवूड
वालो की पसंदीदा शूटिंग का
स्थान है। पश्चिम में पुराणी
बस्ती,
और
तब का तोपखाना है। एक किले को
दुसरे से जोडती टेढ़ी मेढ़ी
सुरंगों का जवाब नहीं। सवाई
जय सिंह जी मूलत:
एक
सिपाही थे मगर दिमाग एक इंजिनियर
का पाया था। बड़े पैमानों को
सादगी के साथ स्थापत्य में
प्रयोग किया। राष्ट्रीय
राजमार्ग हो या चौपर से चौपड तक
की सड़के सब एक सीध और दूरी ,
गलिया
ऐसी की आप खो नहीं सकते अंतत:
वापस
किसी न किसी मुख्या सड़क या
चौपड पर आ जाते है घूम कर।
सिरह
ड्योडी को बान्दरवाल का दरवाजा
भी कहते है। राजमहल के चारो
और दीवार है जिसे आम बोल चाल
की भाषा में सरहद बोल जाता
है।
कदम
दर कदम राजसी वैभव,
दरबारी
संस्कृति को प्रस्तुत करता
आमेर का किला ,
किले
के मध्य शहर की आराध्य देवी
माँ ..
का
मंदिर आज भी जिसके भक्तो में
अटूट श्रद्धा है कहते है इसमें
विराजमान माँ काली की प्रतिमा,
महाराजा
मानसिंह को सपने में साक्षात
दर्शन के बाद लायी गई थी। शहर
के मध्य में राजमहल,
वर्तमान
में शहर की अनमोल धरोहर,
पांडुलिपियों
को सहेजे पोथी खाना,
विशाल
चांदी का कलश और अन्य राजसी
साजो सामान का मुजियम .जयपुर
आयें तो देखना न भूले।
राजमहल
की सरहद से सीधे दर्शन होते
है,
शहर
की जनता आम और ख़ास सबके आराध्य
देव गोविन्द देव जी का विश्व
विख्यात भव्य मंदिर,
राजमहल
के झरोखों से साफ़ दर्शन होते
है आराध्य के। मंदिर के बाहर
पुरानी विधानसभा और जलेब चौक
(
रक्षा
दल का स्थान ),
यहीं
वो लोग रहते है जो तीज,
गणगौर
की सवारी का लवाजमा तैयार करते
है,
पहले
के टाइम में ये ही लोग राज की
नगर परिक्रमा की ज़िम्मेदारी
लिए थे। जयपुर के पूर्व में
सिसोदिया रानी का बाग़ और
विद्याधर का बाग़ दर्शनीय है।
आमेर से लौट ते समय आपको कनक
वृन्दावन ,
पुराना
गोविन्द देव मंदिर अपनी मनमोहक
हरियाली छठा और छत्रियों से
आकर्षित करता है और साथ ही चार
चाँद लगाता,
तपती
धुप में पहाड़ो की से आराम
दिलाता जल महल। आज कल यहाँ
मुंबई के चौपाटी का दृश्य बना
रहता है। जयपुर अब आधुनिकता
की होड़ में बड़े शहरों की गिनती
में है,
बड़े
बड़े माल्स,
आधुनिक
खेल,
पिंक
पर्ल वाटर पार्क,
नामी
विश्वविधायालय,
हाइपर
सिटी से सु सज्जित है। फिर भी
छोटी काशी कहे जाने वाले इस
नगर की गलता तीर्थ को नजर
अंदाज नहीं किया जा सकता।
घाट-गेट
से बाहर ,
चूल्गिरी
की पहाड़ी पर बना विशाल जैन
मंदिर इसके पहाड़ो की शोभा है।
....
क्रमश:
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें