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....खुद अपने से छली गयी
अपने अपनों से छली गई
प्यार के कच्चे धागे के नाम पर
बन्धनों में बाँध बाँध छली गई
पिता बन पुरुष ने सिखाया
तुम्हे साहसी होने का हुनर,
भाई बन पुरुष ने सिखाया
तुम्हे हिम्मत से डटे रहना
माँ बन तुमने सिखाया
रोटी गोल बना न
और इसी लिए तुम अब
आदि हो गई हो किसी न किसी
दिशा सूचक की , रेत की
घडी पर फिसलती , दरकती
इन् बैसाखियों की, .......
लडखडा जाती हो जब नहीं
रहती साथ ये बैसाखियाँ
बैसाखियाँ , बैसाखियाँ ही होती है
टूट जाती है, थक जाती है अपना
महत्व बनाये रखती है और जब टूटने
लगती है तोड़ जाती है तुम्हे और
जाती है तुम्हे हवाले पराई बैसाखियों के
तुम घायल, लडखडाती सी तुम
कर लेती हो सहर्ष स्वीकार
दीमक लगी बैसाखियाँ ...
सीली , गली भीतर तक ,
और फिर चलती हो असुरक्षित
न सम्हली तुम गिर गिर
पटखनी खा खा होती हो
फिर गिरती हो , पिटती हो
उसी बैसाखी से ...
2 . फिर पालती हो
और कई नाजायज बैसाखियाँ
ब्याहती हो किसी और की सुहाग सेज
के फूलो को, बन जाती हो ... भाभी-देवर की,
एक और बैसाखी रखती है हक अब
तुम बंद हो बैसाखियों के बांस
के जंगल में, जब एक एक कर
बांस बड़ा होता है तुम्हारे
कद से कई कई गुना रातो रात
और तुमने खो दिया खुद को
रही तुम अधूरी हर पल ले
साथ बैसाखियों का, न चुना तुमने
खुद की खुदी को , और बन रही
.."अर्ध-सत्य" ..
नारी दीर्घ शीर्षक के अंतर्गत अब तक प्रकाशित २ कविताओ के श्रृंखलातार्गत --- आज २०-७-२०१३ को लोकजंग , भोपाल से प्रकाशित कविता ...
वाह ! क्या अद्भुत विलक्षण अभिव्यक्ति है नारी मन की ….
जवाब देंहटाएंकथा है व्यथा की …।
पीड़ा की …, अकेलेपन की ….
पर होश है की में हूँ …,
अभी बाकी …. एकाकी ….,
एक पाखी …. ,
उड़ना है जिसे …
अपने पूरे अस्तित्व के साथ ,
अपनी ही मंजिलों की ख़ोज में ……