शनिवार, 6 जुलाई 2013

सन्नाटा सा हर तरफ छाया क्यूं है ...


जाने अब केदार का नाथ गया कहाँ है 
सन्नाटा सा हर तरफ छाया सा क्यू है 
सन्नाटा सा हर तरफ छाया सा क्यू है 
आज मनन में ये उदासियाँ क्यूं  है 
दुश्मन करता रहता साजिशें क्यूं है 
पंछी घरोंदे से डरने लगा क्यूं है 
समंदर की गहराइयों में उदासियाँ क्यूं है 
सर उठाये हिमालय अपनी जड़ो से 
डरा सहमा सा क्यूं है ........
गोद में मेरी बैठे केदार क्यूं है 
तीसरी आँख आज फिर मूंदे क्यूं है 
सोच रही भागीरथी मेरा कुसूर क्या है 
आज मेरे बाल-गोपाल मुझ ही से 
खफा खफा से क्यूं है 
इक पागल बादल से हुई ये खता क्यूँ है 
बूँद बूँद बरसता था आज गुर्राया क्यूं है 
यूँ गरज गरज बरसता था उमड़-घुमड़
 नाच नाच कर तांडव मचाया क्यूं है 
*** को गुस्सा आज आया क्यूँ है 
मंदिर बनाया अपने हे त्रिपुरारी 
केदार खुद को कहलाया क्यूं है 
बदला लिया कैसा हमसे 
भूचाल इतना  मचाया क्यूँ है 

नर मुंड की माला से खुद को 
एक बार फिर सजाया क्यूँ है 
वृन्दावन की गलिओं का ग्वाल 
 गोवेर्धन चिट्टी पे उठाने वाले 
हथेली पे हिमालय उठाने आया नहीं क्यूँ है 
बस्तियां बसा बसा के 
निर्मोही यूं उजाड़ता क्यूं है 
ना खुदा मेरे किश्तियों को यु 
घेर घेर बहा ले जाता क्यूँ है 
तुझ को जल अर्पण करने आये 
तूने उनको जल-प्रलय से बहाया क्यूँ है 
बता दे हे  घाट घाटो के  वासी 
 हम जीवो के जीवट को ऐसी 
बेरहमी से मुक्ति घात उतार क्यूँ है 
हम तो आये तेरी लीला देखने 
तूने कोहराम मचाया क्यूँ है। 
तू  शमशानों का वासी है तो 
इस संसार को बसाया क्यूँ है 
हम जीवो को जीते जी
शमशान में दफनाया क्यूँ है 
फिर देख दुबारा महिषासुर सा 
सैलाब आया तू चुपचाप बैठा क्यूँ है
 घर बाहर मत निकलो साथियो
जाने अब केदार का नाथ गया कहाँ है 
सन्नाटा सा हर तरफ छाया सा क्यू है 
आज मनन में ये उदासियाँ क्यूं  है 


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