रविवार, 16 फ़रवरी 2014

ख़ाक हुई अब आहें धूं धूं जली तमन्नाएं

ख़ाक हुई अब आहें
धूं धूं जली तमन्नाएं

वो कब तक ढोयेगा
बोझ एक ज़िंदा लाश का

कैसे सुन लेता है वो टप टप
२ आंसुओ कि आवाज़ दूर रह कर भी

सुना ना सैयाद ने शोर मासूम इन
साँसों का इतने करीब हो कर भी

आती है ज़िंदगी कुछ पल मुद्दतो बाद
 जब खुशबु तेरी हवाएं लाती है

मुर्दा चीखे, जिन्दा साँसे
कब्र से देंगी सदायें तुझे
बाँध कर सोने कि जंजीर से
रखा तूने मेरी लाश को जो  

कातिल है तो फिर वार कर
क़यामत का न इंतिज़ार कर
क्या पता कल क्या हो ....

मंजूर नहीं अब मुझको ये सौदे बाजी
न तू नफे कि उम्मीद कर न
मैं अब नुक्सान कि फसल करू

खेल बहोत भा गया उनको कुछ ऐसा वो
तोड़ते रहते है दिल खिलौना समझ बार बार न जाने कैसा

करेंगे वो इंतिज़ार तेरे अल्फाजो का
ज़िंदगी को जिनकी इंतिज़ार परवाज़ो का


और एक गुनाह हुआ
और एक जिन्दा लड़की का जन्म हुआ

आ बैठ पास मेरे कर कतल मेरे अरमानो का
देखे किसके होसले पहले दम तोड़ते है

ले कुछ लहू मेरे अरमानो का
सजा सेहरा तेरे अरमानो का

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें