सोमवार, 4 जुलाई 2016

आदमी में आदमी की तलाश न कर

इस बदलते वक़्त में खुद अपने
वजूद का यु तो विनाश न कर
मंडराने लगे पौ फ़टे से ही
गिद्द घर की छत पर होश रख
तू खुद को ज़िंदा लाश न कर

आदमी में आदमी की तलाश न कर

रहने दे हवस को बंद कमरो में
तू यूँ खुद को सरे बाजार ना कर
इंसान को  इंसान रहने दे
जानवर की  तलाश न कर

आदमी में आदमी की तलाश न कर

अब कहाँ इंसानियत के ठेकेदार है
रहने दे थोड़ा तो भरम हर एक के जेहन में
यूँ हर एक में इंसानियत की तलाश न कर

आदमी में आदमी की तलाश न कर

है जखम अभी हरे भरे गिरेबानो में
लगा प्यार घोल कर जरा मरहम में
नमकीन साँसों की फूंक से
इन हरे जख्मो को पलाश न कर

आदमी में आदमी की तलाश न कर
इस बदलते वक़्त में खुद अपने
वजूद का यु तो विनाश न कर
आदमी में आदमी की तलाश न कर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें