बुधवार, 8 जून 2016

नारी - जब जब वो लिखेगी

जब जब वो लिखेगी 
मुस्कुराती हुई कलम 
आसुओ में डूब जायेगी
कागज़ भी उसकी नमी को 
अपने सीने में न सोख पायेगा 

जो पढ़ेगा औरत की कहानी 
सदियों तक अपने गरेबान 
उठा कर न चल पायेगा 
लो ... 
देखो क्या अब ये भी मेरी 
कलम ही बताएगी
कल किस माँ की अस्मत से 
कोई बेटा खेल आया 
कल एक बेटी के गेंसु
एक भाई शर्मसार कर आया 
गर्भ में लिए एक सदी का मानव 
चोट सह रही थी सभ्यता 
कुछ वहशियों के हवस की  
मर रही थी संस्कृति
अनखिली , देख रही थी 
तमाशा बर्बरता की हदो का 
निकल निकल आ रहा 
सभ्यता के तहखानो से 
..... देख लो 
मुस्कुराती हुई कलम 
आसुओ में डूब जायेगी
जब जब औरत औरत का 
दर्द दर्द में भीगे शब्दों में सुनाएगी .    

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