शुक्रवार, 3 जून 2022

कश्मीरी हवाएं

 पानियों की किश्ती पानियों से लिखी चिट्ठियां, पानियों में बहते हुए शब्दों से जज्बात, पानियों पे चलती मिलती बिछड़ती  परछाइयां हम तुम, 


जानती हूँ  मैं  बहोत गहरी नही व्व झील तेरे शहर की या रब

मगर हर्ज क्या है एक किनारे का दूसरे किनारे से मिलने की तलब में या रब 


उन हवाओ पर तैरते, तेरे शहर का एक बादल चुरा लिया मैंने आखिर कुछ तो बात थी कि बहोत दूर तक चली मैं मगर फिर तुझ तक न पहुंची मैं ,


 तूने तो कहा था दिल से दिल को राह होती है 

जानती हूं मैं ये महज वहम की बाते होती है या रब । 


Dr-Anita Rathi

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