बुधवार, 19 मार्च 2014

जमाना लगा कहने नूर-ए-नज़र, नूर-ए-नज़र


तेरे आने से बस ख्वाबो कि ताबीर हो रही है
ज़िंदगी अब ज़िंदगी से ख़ुशी ख़ुशी फ़ना हो रही है

कुछ यूँ भी वो शब्  गुजारा करते है
खवाबो में हसरतो से खेला करते है

चुनती थी शबनम गुलो से सुर्खी खुद पिघल पिघल
तभी तो चमन खुश्बुओ से सरोबार या रब .......

तलाश-ए-ज़िंदगी में हम भटका किये इस कदर हर बार
बियाबानों से गुजरते गए कांटो ने लहू-लुहान कर दिया

दर्द का अहसास अपना सा लगता है
मुहब्बत में तेरा न आना भी अच्छा लगता है

इश्क मुहब्बत कि बातें उनको फिजूल  लगती है
आप सरे राह क़त्ल-ए-आम कर गए वो कुछ नहीं

उनकी  नजरिए-इनायत क्या हुई  ,
यहाँ तो मौत का सामां  हो  गया

उनके इश्क में तराशे गए क्या खूब
जमाना लगा कहने नूर-ए-नज़र, नूर-ए-नज़र

तारीफ़ वो करते है अंदाज-ए-ब्यान  बदल बदल
फिर भी कहते है जालिम है आपकी अदावत या रब

हम उनको अपना बना बैठे या रब
आतिश-ए-ज़िंदगानी पे ज़िंदगी लगा बैठे

मैय्यत पे मेरी कफ़न न रखना दोस्तों
मैंने ताज उनकी मुहब्बतो का पहना है

एक सफ़र तनहा कटा : इक सफ़र  में तन्हाई न मिली
ज़िंदगी को तनहा काटा जिसने : जनाजे को उसके तन्हाई न मिली


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