बचपन से अक्सर देखती हु दोस्तों को रंगबिरंगी पतंगों के पीछे भागते ... घर के दालान में लगी थी बाढ़ देशी गुलाबो और तरह तरह के फूलो की रंग बिरंगी तितलियों को पकड़ते साथी .... ना कभी किसी पतंग को पकड़ने की ख्वाहिश हुई न किसी आकर्षित करने वाले जीव की तरफ भागने की ... की पा लू लपक कर छीन झपट कर .... क्यों ... क्यूंकि इतनी प्यारी प्यारी तितलियों में से एक तो ऐसी होती थी जो मुझे पाना चाहती थी और में बहोत खुश होती जब एक तितली मेरे काँधे पर या हाथपरा बैठती ... आज भी कबूतरो के झुण्ड के पास जाकर एक आध घंटा उनको अठखेलिया करते देखती हु ... फिर कोई एक कबूतर आकरहाथ पे छू जाता है तो सोचती हु ...बास इतना काफी है .... भागना नहीं किसी के पीछे ... इंतिजार करना ... बस ...इन्तिज़ार ... नया साल आता होगा ... खुद चल कर आएगा
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