बड़ी अजीब शय है ये इंसान नाम का परिंदा .. उम्मीदों और ख्वाहिशो का पुलंदा और अंतत: उम्मीदों और ख्वाहिशो के साथ सिमट कर समय की दादागिरी के आगे अपने ढाई दिन के झोपड़े से टुकुर टुकुर निहारता रहता है ... करे भी क्या न ... आसान हा उम्मीदों और ख्वाहिशो को पाल लेना मुश्किल है उनका परिणय समय से गठबंधन ....
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