गुरुवार, 23 जनवरी 2014

कब्र कि दीवारो से ... चीत्कार एक आएगी



कब्र कि दीवारो से
चीत्कार एक आएगी 
रूह किसी प्यासे कि 
जब-जब हुक जगाएगी 
दूर कहीं नारंगी क्षितिज 
पर जब जब दिनभर का 
भुला लौट लौट आएगा 
घमंड धरा के समंदरों का 
धरा का धरा ही रह जायेगा 
आग उसके सीने कि तृप्त 
न कभी हो सकेगी ... 
सुन लेना तुम भी वो 
जब जब चीर कर सीना 
कब्र कि दीवारो से
चीत्कार एक आएगी 
हरी नरम घास के सीने पर
जब ओस कि बुँदे इठलाएंगी
ओढ़ चुनरिया गुलाबी जब 
सुबहा कि लाली आएगी 
काली सियाह रात बैठेगी 
संग किसी भटकी रूह के कंधो पर 
और चुपके से जाकर चंदा के 
आँगन में चेहरा छुपा बैठ जायेगी 
सुन लेना उस वक़्त ..... 
कब्र कि दीवारो से
चीत्कार एक आएगी 
लौटता हुआ हल खेतो से 
गोधूलि खूब उड़ाएगा 
प्रणय संध्या प्यारी का 
अपने साजन से हो जायेगा
पंछी सारे गाते होंगे तब 
जाते जाते वो सफ़ेद सिल्क 
के कफ़न में लिपटी धुप भी 
एक बार फिर आंसू बहाएगी 
उस के मिलने और न मिलने 
कि खाई को अब वो कभी न 
पाट पायेगी ... उस वक़्त
मेरे प्रिये तुम भी सुन लेना ...
कब्र कि दीवारो से
चीत्कार एक आएगी 

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