रविवार, 5 जनवरी 2014

जिधर देखु तेरा अक्स नजर आता है
दिल कि बस्ती में इक मुहिब सन्नाटा है
धड़कन धड़कन खामोश सी धड़कती तो  है

लगन को है नशत-ए-कार कितने कितने या रब
न हो मरना मौका-बा-मौका तो जीने का मजा क्या ...

यक-सार जहां-ए-गुरुर कहा क्या होगा अंजाम
जां-निसार कहते हमें तो बात कुछ और थी

चेहरे कि लकीरो से आप कि रौनक-ए-आम-औ-ख़ास दिख जाती है
पता चलता है बहोत गुरुर है तेरी फ़ितरतों में, फितरत दिख ही जाती है

ला तेरे इश्क़ में चलूँ जलते अंगारो पर 
कसम खा कि तू जले जख्मो पर नमक नहीं डालेगा

 ज़िंदा हूँ मगर ज़िंदगी का नाम-ओ-निशाँ पता नहीं 
मुसाफिर हूँ सफ़र है मंजिल भी है साथी कोई नहीं 

आती है रोज़ रोज़ तेरी यादो सी लहरें 
न जाने बेवजह साहिल से मिलती क्यों नहीं


दरिया ओ मय में डूबे मयकदों 
के होते है जाने दीवाने कितने
साहिल पे रुकते किसी को देखा नहीं फिर भी


लो फिर आज रोशन जहाँ कर लो 
ये शम्मा यु ही जलेगी तमाम रात ...


दर्द ए मुहब्बत कि लौ जलाये रखती है 
इक शम्मा परवाने कि आस लगाये रखती है

सब्र के लूम पर ख्वाबो के सूत काट रही हु 
आओगे तुम इक दिन इक जाल खुद के लिए बुन रही हु


सुर्ख गुलो का साथ पसंद है हमें तुम कभी कभी
मेरी खिड़की से यूँ बे - मौका भी नज़र आया करो Aameen


चाँद बनके तुम झरोखे में आया करो आजायेंगे
हम भी यु ही भटकते तुम रोज़ बुलाया करो ..






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें