रविवार, 28 जनवरी 2024

कविता

 मुझे नदी होना है

मैं गहरी होऊ

चाहे जितनी मगर

मिलना है समंदर से

ताकि खो जाउ

एक वजूद होकर।

मैं जी लू

अनन्त अनगिनत 

गहराईयों को

और तार दो

तुम मुझे इस

भव से । 

Dr-Anita Rathi

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