रविवार, 28 जनवरी 2024

कविता

 भीगी थी बारिश में मैं 

और कई कई बरिशे थी पलकों में 


भीगे थे मेरे सपनों के पंख 

और नयन  हुए थे नदी का रुख 


झरने लगे शब्दों के झरने 

रूह हो रही थी पानी पानी 


शोर कर रहे थे अरमान  

छेड रही थी पगली पवन 


देख अकेली लगा छेड़ने  

वो एक आवारा बादल 


भीगी थी बारिश में मैं 

और कई कई बरिशे थी पलकों में


-@डॉ अनिता राठी

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