भीगी थी बारिश में मैं
और कई कई बरिशे थी पलकों में
भीगे थे मेरे सपनों के पंख
और नयन हुए थे नदी का रुख
झरने लगे शब्दों के झरने
रूह हो रही थी पानी पानी
शोर कर रहे थे अरमान
छेड रही थी पगली पवन
देख अकेली लगा छेड़ने
वो एक आवारा बादल
भीगी थी बारिश में मैं
और कई कई बरिशे थी पलकों में
-@डॉ अनिता राठी
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