तनी हुई थी वो पत्थर की दीवार सी
मैंने एक दिन उसे विक्षोभ से ढहते देखा
गुरुर जिसे घेरे था जिन कंकरो का
मैंने उन कंकरो को उस अभिमान पर बरसते देखा
जानकर ठंडी छाया जिन कोपलों की हरे रंग को वो बैठी थी गुरुर में
मैने उस गुरुर के पतझड को होकर पत्ता-पत्ता बवंडरों के साथ उड़ते देखा ।
Dr-Anita Rathi
3/April/2021
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें