बुधवार, 3 अप्रैल 2024

कविता

 तनी हुई थी वो पत्थर की दीवार सी 

मैंने एक दिन उसे विक्षोभ से ढहते देखा

गुरुर जिसे घेरे था जिन कंकरो का

मैंने उन कंकरो को उस अभिमान पर बरसते देखा

जानकर ठंडी छाया जिन कोपलों की हरे रंग को वो बैठी थी गुरुर में

मैने उस गुरुर के पतझड को होकर पत्ता-पत्ता बवंडरों के साथ उड़ते देखा ।

Dr-Anita Rathi 

3/April/2021

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें