बुधवार, 3 अप्रैल 2024

हासिल

 रोने से क्या हासिल 

जो समझ ना पाए

मुहब्बत को अ दिल

वो क्या समझ पाएंगे

दर्द पराए  अ दिल।


आग लगेगी बस्ती में

जब ख्वाबो की उनकी

शायद याद आये उनको

कागज की कश्ती भी 

उनको उस दिन । 


बैठ कर इत्मीनान से 

वो देख रहे थे तमाशा

सेहरे के सुर्ख फूलों से

मेरे अरमानों के जनाजे का।


अब जब जख्मो को सी लिया

तुरप तुरप हमने या रबं

क्या करोगे यूँ मेरी आवाज से

अब अपनी आवाज मिलाकर ।

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