रोने से क्या हासिल
जो समझ ना पाए
मुहब्बत को अ दिल
वो क्या समझ पाएंगे
दर्द पराए अ दिल।
आग लगेगी बस्ती में
जब ख्वाबो की उनकी
शायद याद आये उनको
कागज की कश्ती भी
उनको उस दिन ।
बैठ कर इत्मीनान से
वो देख रहे थे तमाशा
सेहरे के सुर्ख फूलों से
मेरे अरमानों के जनाजे का।
अब जब जख्मो को सी लिया
तुरप तुरप हमने या रबं
क्या करोगे यूँ मेरी आवाज से
अब अपनी आवाज मिलाकर ।
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