ज्यादा तो कुछ नही
मगर रह रह कर
उसका रंग बदलना
याद आ जाता है,
होली जब जब आये है
वो वक्त पर उसका
मुकरना याद आ जाता है
चाँद पूनम का और रंग सफेद
फिर उस पर गुजरे दिनों का
वो स्याह अँधेरा याद आ जाता है
बिखर कर मोती की माला से
कुछ किरचों में खुद का
बिखर जाना याद आ जाता है।
उस परिंदे के पँखो की गर्म हवा
में खुद को पिघलते देखा था
और फिर पिघलकर पत्थर हुआ
दिल, दिल का यूँ
खुद में सिमट जाना
याद आ जाता है ।
सब रंगों से ऊब गयी हूँ
अब रंगों में रंग सफेद
ही मन को बहोत भाता है।
Dr-Anita Rathi
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