बुधवार, 3 अप्रैल 2024

रंग पे रंग

 ज्यादा तो कुछ नही 

मगर रह रह कर

 उसका रंग बदलना

 याद आ जाता है,

होली जब जब आये है

वो वक्त पर उसका 

मुकरना याद आ जाता है

चाँद पूनम का और रंग सफेद

फिर उस पर गुजरे दिनों का

वो स्याह अँधेरा याद आ जाता है

बिखर कर मोती की माला से

कुछ किरचों में खुद का 

बिखर जाना याद आ जाता है।

उस परिंदे के पँखो की गर्म हवा

में खुद को पिघलते देखा था

और फिर पिघलकर पत्थर हुआ

दिल, दिल का यूँ 

खुद में सिमट जाना

याद आ जाता है ।

सब रंगों से ऊब गयी हूँ

अब रंगों में रंग सफेद

ही मन को बहोत भाता है। 


Dr-Anita Rathi

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