गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

संस्कृति

क्या ढूंढते हो 
पत्थर के सनम 
पत्थर के खुदा 
पत्थर के सब 
इंसान देखे 
ढूंढा बहोत 
गली गली 
उस मसीहा को 
लेकिन सारे पत्थर 
में ढल मंदिर में 
कैद मिले
सोचा था बहोत
आओगे तुम न आये
द्रौपदी का चीर तो
खुद पांडव उधेड़ते मिले
काल के हाथो
से बचा न पाये
संस्कृति को यु
चौराहो पे लूटते देख के
पत्थर के लोग
रहे खामोश,
पन्ने पलट ते
रहे अखबारो के
चीखे बहोत सुनी
गली के पहरे दारो ने
देख गंदे पैरो को
मोर सी रोई बहोत
मोरनी मखमली
बिस्तर के किनारो से
फटी ऐड़ियों कि दर्दीली
दरारो से टपकते लहू के
कतरो से रिस्ते दर्द से
घायल सी एक बेवा
पाल रही न जाने
किस किस के
बाल -गोपालो को
सेरोगेट मदर है
अपनी कोख बेच बेच
दे रही उम्र अपने
कांधा देने वालो को

(कहीं दूर चिल्ला रहा था एक रेडिओ ... " औरत ने जनम दिया मर्दो को ..... मर्दो ने उसे बाजार दिया "

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