आँधियों से नहीं हम डरते
हम तूफ़ानो में पले है
बैसाखिओं पर नहीं हम चलते
हम अपने दम पर चलते है
रुई के फाहे सी हो चाहे
बनावट मेरी हस्ती कि
मिट जाऊ भले धुआ धुआ
नाजुक हु कमजोर नहीं
कठोर सर्द रातों का मौसम
जितना गहरा होगा
बसंत और इंद्रधनुषी रंग
लिए उतना निखर होगा
बारूद से डर जाऊ ऐसी नहीं मैं
चिराग-ए-दिल जलाती हु मैं
जल-बुझु कर दूर तिमिर गहरा
या के जला के ख़ाक कर दू
शहर सारा, ऐसी हो सकती नहीं मैं
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