सोमवार, 30 दिसंबर 2013

थोडा और ठहर मेरी जां चली जाना,

थोडा और ठहर मेरी जां चली जाना,
किसी से यु मुह मोड़ कर जाना अच्छा नहीं होता

क्योंकि, गुफ़तगू तो उनसे रोज होती है मगर
मुद्दतो हो जाती है सामना नहीं होता

सुरूर सा रहता है हल्का हल्का हर वक्त मगर
उसके इश्क में खो दू होश नशा उतना भी नहीं होता

घर में रहना बाहर न आना तुम में आग है
आज शहर भर में ठंडक है जियादा मगर
हर किसी से हंस के मिलना अच्छा नहीं होता

है ये सफ़र बहोत प्यारा जो निकल सको मेरे साथ मगर
ध्यान इतना रहे तुम तुम रहना क्योंकि
तेरे साथ भी रहु और मैं भी रहे ऐसा मुझ से नहीं होता

हर मुसाफिर कि किस्मत में मंज़िल नहीं होती मगर
हमसफ़र दिलबर सा मिल जाये ये भी कुछ कम नहीं होता


तुमने देखा बड़ी इनायतों से आँखों आँखों में बात तो हुई मगर
ना मेरा दिल चखो समझ पता गर तेरा इस इशार भर न होता

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