रविवार, 22 दिसंबर 2013

' प्यार ' एक गजल ...

' प्यार ' मेरी एक गजल  ...


तुमको तुम्हारी दरियादिली कि कसम या रब
अपने हाथो कि लकीरो में बसा ले मुझको

मैं जो काबिल नहीं तेरे शान-ये-गुलिस्तां या रब
तो यूँ कर अपने कदमो कि धुल पे बिछा ले मुझको

रोशन हो सके कुछ दूर ज़िंदगी तेरी या रब
यूँ कर फिर दीया वो माटी का मान जला ले मुझको

दुनिया कि आँधियों से बचा लू तुझको या रब
यूँ कर दर्द के सेहरा का पता अब दे दे मुझको

तेरी हस्ती पर आंच न आये कभी या रब
मेरी हस्ती मिटने का कोई आज सबब दे मुझको

मैं चली जाउंगी ना आउंगी याद तुझको या रब
करू खुद को सुपूर्द-ये-खाख उस समंदर का पता दे मुझको

कल कि बात और है मैं सांस और ले सकू न ले सकू या रब
जितना जी चाहे तू आज सता ले मुझको  

मेरे प्यार कि किस्मत में गर तेरी बे-बफाई ही है या रब
तो बे-बफाई सिखा करना इस दुनिया से मुझको  


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