मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

जाम हो या जान हो , तुम्हारी गिरफ्त में हो तो बात हो ...

मेरी आँखों में आंसू थे
तेरी खातिर, जमाने 
तूने दिए दर्द इस कदर
 ज़माने कि खातिर 


कहने से अगर ऐतबार हो जाये
छू भर लेने से गर प्यार हो जाये 
तेरे कूचे से हमेशा को हम चले जाये........... 
कातिल मेरे जो  इक बार तेरा दीदार हो जाये 


भीड़ भर के साये सुभा से शाम मिलते है 
कितने बिस्मिल है जिनसे दिल मिलते है 



तोड़ो दिल मेरा इत्मीनान से 
हक़ दिया हमने आपको ऐतबार से 
बस हक़ अता अब तुम करना 
आवाज़ न हो दिल यू तोडा करना

बेसबब मुहबत का अंजाम हम भी देखेंगे
तेरी बाहों में जाती है जान
 खुली आँखों से हम भी देखेंगे


एक वक़्त ही नहीं साथ मेरे और क्या
वरना, रखा है क्या इश्क-ए-ज़िंदगी में  


जाम हो या जान हो ,
तुम्हारी गिरफ्त में हो तो बात हो


ला पिला दे साकिया , जाम ऐसा अनूठा 
छोड़ा जिसको मुहब्बत के प्यासे ने झूठा  ... 


मयकदे के जाम में मय घटी जाय है 
साकी दे दे पता मयकश को 
अब मुहब्बत के मसीहा का 


साथी साथ होते है 
रस्ते आसान होते है
मिलते नहीं हीरे पेड़ो पर 
कोयले कि खान में रखे होते है  



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