दर्द की एक अनवरत दास्तान छिड़ गई
जिंदगी बनके खार समंदर रह गई
उनको क्या कहे जो बाग़बाँ है मुल्क के
अब तो शाखों पर सूखती कलियाँ रह गई
जश्न जिंदगी के हवा हो रहे मद्धम मद्धम
जिंदगी अब दर्द के शूलों में लहूलुहान रह गई ।
@कॉपीराइट डॉ अनीता राठी
जिंदगी बनके खार समंदर रह गई
उनको क्या कहे जो बाग़बाँ है मुल्क के
अब तो शाखों पर सूखती कलियाँ रह गई
जश्न जिंदगी के हवा हो रहे मद्धम मद्धम
जिंदगी अब दर्द के शूलों में लहूलुहान रह गई ।
@कॉपीराइट डॉ अनीता राठी
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