'नीम के पेड़'
नीम का वो पेड़
चौक के बीचोबीच
वो मोटी रस्सी का
बड़ा सा झूला
वो सावन की बारिश
तीज का लहरिया
मम्मी की सहेलियां
मौसी और मामीयां
बहन-बाई और बुहाजियाँ
एक भी uncle नही थे
ना ही थी कोई आंटियाँ
सब चाचाजी और मामाजी थे
सड़क किनारे बड़े बड़े नीम
नीम तले ताश खेलते दादजी थे
तब राष्ट्रीय राजमार्ग नही थे
सड़क भी अपनी बपौती थी
जब मैँ बहोत छोटी बच्ची थी
कच्चे घर थे मगर सच्चे रिश्ते थे
खुशी पास होने में होती थी
परसेंटेज के कोई मायने ना थे
मेरिट नही थी किसी धेले की
घमण्ड के घुटने तोड़े जाते थे
मुस्कुराहटें रोते चेहरों पर
जब तलक ना ले देते थे
आधे मुहल्ले के लोगो के
गले मे न निवाले उतरते थे
लाइट चली जाए तो
मुहल्ले में उत्सव हो जाता था
लु और गर्मी के थपेड़ों का भी
अपना ही मजा होता था
@डॉ अनिता राठी 'राहिराज -
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