" ऋतू
"
आधुनिक
शहर के आधुनिक लोग और आधुनिक
शहर के आधुनिक रोग ....अजीब
लगता है न जब में ऐसा कुछ बोलती
हु लिखती हु मगर करू ही क्या
जब
सुना मेरा शहर पोस्ट-मॉडर्निटी
की फेहरिस्त में आ गया, मेट्रो
आगई है, मेरा
मासूम मन डर गया, अब
मेरी बेटी कॉलेज कैसे जाएगी, सड़क
पर अकेली क्या चल पायेगी, क्या
क्या सम्झाओंगी इसके कोमल मन
को,
कीचड़
से बचना, कांटो
से बचना, कंकर
पत्थर से बचना , अपना
शहर आधुनिक हो गया मेरी
गुडिया........
आदमी
की जात से बचना.... क्या
आदमी किसी बीमारी का नाम है,
फिर
क्या जवाब दूंगी उसको....जब
वो कहेगी...
फिर....
चाचा, ताया, मामा, पड़ोस
वाले भैया, ये
भी तो आदमी है, माँ
तू कल बोली थी ये तेरे रिश्ते
है, आज
कहती है आदमी की जात से बचना......
ढंग
से समझा न माँ....
हर
माँ नीर-उत्तर....
अपने
आप समझ जाएगी...!
अरे
ऐसा क्यों सोचती हो .....?
दुनिया
यु ही थोड़े ही चल रही है,
और
फिर अभी चिंकी बहोत छोटी है
तुम तो खाम-अ-खां
परेशां होती रहती हो .....
आधुनिक
मतलब रेप,
मर्डर
,
ड्रिंक
,
धुँआ
और नशा....... हाँ
यही तो आधुनिक मतलब रेप,
मर्डर
,
ड्रिंक
,
धुँआ
और नशा ,
लूट
पाट और क्या ....
'
हाँ
ठीक ही कहते हो लेकिन ......
' लेकिन
....
क्या
....
यही
एक यक्ष प्रश्न मान हु न ...
अरे
तो भाई पूरी कॉलोनी में सभी
माँ है सभी के घरो में बेटियां
भी है सभी पढने भी जाती .है
......
...
तो
क्या जाती तो है उनकी माँ से
पूछो ....
वो
भी मेरी ही तरह परेशां रहती
है
...लो
चलो नाश्ता कर लो ..
चिंकी
आओ बेटा दूध पीओ,
...... 'हां
माँ में पी लुंगी पहले मेरी
बुक्स तो रख लू ऑटो वाले जी
आते ही होंगे ...
' उसी
वक़्त ऑटो की आवाज़ सुन दिल धक्
से धड़क उठा ....
बीटा
चलो ऑटो वालेजी ने आवाज लगे
चिंकी अपना बैग और पानी की
बोतल लिए जा बैठी ऑटो में पीछे
मुद मुद कर बाय बाय करती नहीं
सी चिंकी माँ को भीगी आँखों
से देख हंस भी रही थी और माँ
से दूर होती रो भी रही थी,
...... लग
रहा था जैसे ....
शादी
के वक़्त बेटी को डोली में बिठा
विदा कर रही हु.
मन
ख़राब सा हुआ अंदर आ काम काज
निपटने लगी।
.....
डोर
बेल की आवाज़ घन-घना
उठी,
..... जा
कर देखा एक भद्र महिला अपनी
जवान बेहद खूबसूरत बेटी के
साथ खड़ी थी आप इंग्लिश लिटरेचर
पढ़ाती है न ...
मैंने
एक टक उनको देखा ...
उन्होंने
मुझे देखा .....
' जी
अंदर आइये न बैठिये एक मिनिट
में आती हु… कह कर अंदर गयी और
चिकि के पापा को उनका टिफिन
पकड़ा कर ऑफिस के लिए विदा किया
.
तब
तक दोनों माँ बेटी चुपचाप बैठी
इत्मीनान से मेरा इन्तिज़ार
करती रही,
.....
' हाँ
अब कहिये क्या बात है,
माँ
ने तुरंत मेरे सवाल का जवाब
दोनों हाथ जोड़ कर खड़े होते हुए
कहने
लगी,ये
मेरी बेटी है,
ऋतू,
अभी
बी ए सेकंड इयर का इम्तिहान
दिया था इस वर्ष लेकिन ये
इंग्लिश लित्रेचेर के पेपर
में सप्लीमेंट्री आई है,....
अब
इसके एक्साम्स ह इसको आप अपनी
बेटी मान कर तैयारी करवा दीजिये
बा मुश्किल आपका पता मिला है,
....... 'जी
वो सब तो ठीक है मगर .....
अब
तो इम्तिहान में एक महिना भी
नहीं है,
और
कोर्स इतना जियादा ...
नहीं
नहीं मैं नहीं करवा पाऊँगी
और फिर मेरी खुद की तबियत ठीक
नहीं '.....
नहीं
मैडम मना मत कीजिये आपके घर
का काम मैं करवा दूंगी मगर आप
इसका साल ख़राब होने से बचा
लीजिये इसको हेल्प चाहिए आपकी
आप की फीस से डबल फीस ले लीजिये
....
' नहीं
नहीं ऐसा थोड़े ही होता है,
फीस
की बात नहीं में समय कहाँ से
लाऊंगी ,
और
फिर अंतिम वर्ष की तयारी भी
करवानी होगी ,
... नहीं
नहीं मुझसे नहीं होगा आप किसी
और टयूटर से बात करें मुझे माफ़
करें'
... बच्ची
की आँखे भर आई माँ को यु मेरे
सामने बोलते देख ....
मेरा
भी सीना भर आया ...
बड़ी
अजीब सी स्तिथि थी,
.... मैडम
प्लीज,
मेरे
एक नहीं दो दो साल का सवाल है'
मैंने
थोड़ी कठोर होते हुए कहा ठीक
है,
अगर
पांच घंटे में पढ़ाउंगी तो पांच
घंटे तुम घर जाकर याद करोगी
,
और
दुसरे दिन मुझे सुनाओगी एक
भी दिन चुकी तो उसी दिन से क्लास
स्टॉप ......
मैडम
मैं प्रोमिस करती हु ,
बीच
में ही माँ ने बेटी का पक्ष
लेते हुए कहा...
और
...
कोर्स
की फीस दो दिन बाद जमा करवाने
की कह ,
अगले
दिन से क्लास शुरू करने का
वादा ले कर लौट गई ....
माँ
की आंखो में जो सुकून था ...उसे
पहचान गई थी मैं
उनके
तेज कदमो की चाल और चेहरे की
मुस्कान से
...........
अगले
ही दिन सुबह चिंकी को स्कूल
भेज मैं अपने काम निपटने लगी
....
ठीक
आठ बजे बेल बजी सामने ऋतू खड़ी
थी,
.... अपनी
चिरपरिचित आदत के मुताबिक
मैंने उसे फॉर्म भरने को दिया
और फीस ...
जमा
करवाने की कही,
वो
थोड़ी सहम सी गई,
मैडम
मम्मी सिलाई करती है,
आपकी
फीस के १५०००/-
में
२००० रुपये कम पड रहे थे कल तक
मम्मी के सिलाई वालो से आ
जायेंगे तो हम आपको ज़रूर
ला देङ्गे'
मैं
स्तब्ध थी देखने में वो किसी
राजकुमारी से कम न थी,
बेटी
से जियादा माँ की ख़ूबसूरती
का नूर मेरी आँखों में समां
गया था...…
मन
अजीब सा हो उठा हे परमात्मा
ये कैसी नियति है .....
' आपके
पापा वो क्या करते है'
वो
....
वो
...
कुछ
नहीं करते .....
वो
कहते है,
करूँगा
तो खुद का ही बिसनेस करूँगा
नहीं तो कुछ नहीं करूँगा',
..... अरे….
ये
क्या बात है….
और
घर खर्च ...
वो
तो मम्मी सिलाई करके हम तीन
भाई बहनों का खर्च चलाती है'
......... मन
खिन्नता से भर उठा,
ऐसे
निकम्मे आदमी को भगवान् औलाद
क्यों देता है इतनी
प्यारी फूल सी बच्ची को कैसे
पाल रहा है एक इंसान ........
कमाल
है ....
........खैर
उसकी पढाई शुरू करवाई ,
खूब
मेहनत की उसने ..
अपनी
माँ के शब्दों को एक दिन भी
झूठा नहीं होने दिया ...
एक्साम्स
तक उसकी बेहद खूबसूरत आँखों
में लाली रहती,
न
सो पाने की ,
कड़ी
मेहनत की थी उसने.....
मेरा
नाम किया दोनों साल के पेपर
पास ही नहीं किये ६०%
से
ऊपर मार्क्स ला कर खुद को प्रूव
किया था उसने। उसके बाद मेरा
और उसका एक बड़ा ही प्यारा रिश्ता
बन गया था टीचर और स्टूडेंट
से इतर एक दोस्त का रिश्ता
अपने ,
घर
परिवार के सुख दुःख का पूरा
ब्यौरा देती,
अगले
साल एम् ए इंग्लिश का फॉर्म
भर फिर मुझसे जुड़ गई,
२
साल पंख लगा कर उद्द गए ,
उस
दोरान उसका चाल चलन एक दम
संस्कारी था। एम् ए के बाद
मेरा ऋतू से मिलना कम हो चला
था ......
कभी
कभार मिलने आती तो बताती,
पापा
कुछ नहीं करते ....
मम्मी
को दिखना बिलकुल कम हो गया,
बी
पि हाई रहता है,
डॉक्टर
ने सिलाई न करने की सलाह दी
है। अब मुझे ही घर चलाना है
...
'ठीक
है,
कोई
नोकरी कर लो साथ ही ब.
एड
भी कर लो उसने ऐसा ही किया .....
परन्तु
ये क्या ...
एक
दिन आई तो कुछ फेशनेबल कपडे,
स्टाइलिश
हेअरकट......
'आओ
ऋतू कैसी हो '
बहोत
मजे में है मैडम ....
' अच्छा
कहाँ जॉब कर रही हो अभि…....
'मैडम
स्कूल की नोकरी में तो बहोत
कम पैसे देते थे ...
इसी
लिए अब एक प्रॉपर्टी ब्रोकर
के जॉब कर ली ..
ओके
गुड ....अच्छा
अपना ख्याल रखना ..
जी
मैडम ....
.....
घर
के तक ऋतू को छोड़ने की आदत
सी थी सो मैं गेट तक आई तो देखा
बाहर दूर गली के कार्नर पर बड़ी
सी ब्लैक पजेरो खड़ी थी,
ऋतू
ने गेट से ही मैडम अब आप
जाओ में चली जाउंगी ....
' ओके
बाय। ..चिकि
का
ऑटो आ गया था उसी वक़्त… जरा
घूम के देखा ऋतू पजेरो में बैठ
जा चुकी थी। .....
मेरे
मनन में शक हो आया माँ ने दूध
से नहलाया होगा,
कच्चे
रेशम की बंधेंज वाली ओधनी में
लपेटा होगा,
तब
ये सा तन इतने निखार लिया
होगा ...
बादाम
खाए नहीं होंगे इसकी आँखों
के लिए सुरमा बना लिया होगा...
तो
ये मृग-नयन
इसके इतने सुदर है .....
चिकि
को गोद में ले अंदर चली गई।
....
कुछ दिन
यु ही गुजर गये… एक दिन शाम
चिकि जिद करने लगी चलो न आइसक्रीम
खा कर आयेंगे ,
गार्डन
जायेंगे चलो न मम्मी ...
बाल
हट के आगे कौन जीत पाया ...
चिंकी
के पापा ने बाइक निकाली और चल
दिए ....
सैटरडे
का दिन था ...
हम
लोग चिकि को इसे क्रीम दिल सरस
पार्लर से जैसे ही मुड़े अचानक
एक हौंडासिटी पर नज़र थम सी गई,
ऋतू
तीन चार युवको के साथ कार में
बड़ी अजीबो गरीब कपडे पहने बैठी
दिखी पहले तो सोचा जाने दो
उसकी उम्र है,
फिर
सोचा नहीं नहीं रात होने चली
ये यहाँ सुनसान सड़क पर क्या
कर रही है,
मैंने
पास जाकर देखा,
देखते
ही होश उड़ गए ऋतू भी बड़ी अनमनी
हो गई,
.... ऋतू
...
कैसी
हो,
में
ठीक हु अभी आप जाओ कल आपके पास
आउंगी
मैडम,........
लेकिन
ऋतू ....
हाँ
.....
उठ
कर बहार आने लगी,
लदखडा लडखडा
कर बहार आई .....
मैडम
अ आ आप अभी जाइये प्लीज़,
ओके
ऋतू ...
'कह
मैं वापस बाइक पर आ बैठी,
चिकि
आइसक्रीम खाने में मशगूल
थी,
मेरा
अंतस अन्दर तक बिना आइसक्रीम
के ठंडा हो चूका था ....
हाय
भगवन अच्छी भली लड़की ने ये
क्या रास्ता इख्तियार कर लिया,
क्यों
....
क्या
कारन रहे .......
उदास
हो घर में आकर खाना बनाया,
खिल
कर,
चिकि
को खुद से चिपका सो गई,
एक
डर सा लगा,
क्या
इस दिन के लिए इसकी माँ ने आँखे
गवई वो भी बल की खूबसूरत है,
वो
भी डगर छोड़ देती तो क्या
होता इन् भाई बहनों का ....
ऋतू
तुमसे ऐसी उम्मीद न थी। ....
सोचते
सोचते न जाने कब आँख लग गई,
सुबह
भी देर से आँख खुली,
चिकि
के पापा ने चिकि को दूध पकड़ा
दिया था,
मुझे
चाय का कप थमा पास ही बैठ गए
...
क्या
हुआ लगता है ठीक से सो नहीं
पाई ....
क्यों
..
दुनिया
जहान का टेंशन लेती हो,
क्यों
इतनी परेशान हो जाती हो ये सब
चलता रहता है,
.... आँखों
से आंसू बह निकले नहीं न उसकी
माँ की सोचो ....
उस
माँ की सोचो न ........
रुंधे
गले से इतना बोल नहाने चली गई,
इन्होने
न्यूज़ पेपर पढ़ा और पढ़ते ही
उसके टुकड़े टुकड़े कर डाले ....
मैं
देखती रह गई,
ये
गंगा के पानी की तरह शीतल स्वभाव
के इंसान को क्या हो गया पेपर
ने क्या बिगाड़ा था ...
मैंने
पास आकर पुछा क्या हुआ है ...
ये
चिकि को क्यों चिपका लिए सीने
से ......
पेपर
क्यों ...
क्यों
फाड़ डाला ...
फटे
टुकडो को बीन जैसे तैसे उसे
पेज का रूप दिया .........
नहीं
....न
न.
नहीं
ना… ये ये सब... ये
क्यों किया ...
उन
लोगो ने ...
वो
तो उसके दोस्त थे .....
कोई
ऐसा करता है क्या किसी मासूम
के साथ उनके हाथ नहीं काँपे
,
उनका
ईमान ,
उनकी
माँ,
बहन,
बेटी
कोई तो होगी उस जैसी वो याद
नहीं आई ...
वहशियों
को ...
मतलब
अब मेरी ऋतू मुझसे मिलने कभी
नहीं आएगी ऐसा थोड़े ही होता
है ........
. इन्होने
पानी का गिलास हाथ में थमाया
पी लो और गले के नीचे उतार दो,
तुम्हारी
गोद में चिकि है इसको सम्हालो
में ऑफिस जाता हु ...
और
हाँ किसी से जिक्र मत करना इस
बात का .......
भूल
जाओ ...
वो
...
सिर्फ
स्टूडेंट थी तुम्हारी ,
हर
साल न जाने कितने ही स्टूडेंट
आते है,
चले
जाते है,
उनकी
अपनी जिंदगी है,
............. उनकी
अपनी चोइसेज है,
तुम
उन्हें साहित्य पढ़ा सकती हो,
जीवन
के यथार्थ नहीं ...... वो
चाहे जैसे जिए .... ...तुम
चिकि का ख्याल करो। आधुनिक
शहर के आधुनिक लोग : ये
है आधुनिक शहर के आधुनिक लोग
और इस आधुनिक शहर के आधुनिक
रो|
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