बुधवार, 8 जून 2016

मेरा नाम नारी है"

" हां मेरा नाम नारी है"

हर पल खुद
खुद से ही जूझती
मन ही मन
लरजती सी
बैसाखियों के सहारे
सहारे लडखडाती सी
कभी पापा की
गुडिया सी
तो कभी भैया की
गुडिया सी
घर में होकर
गुड्डियों के संसार
की एक गुडिया सी
जीवन साथी को
सौंप दी गई खूब
लाडो पली गुडिया सी
दिल के करीब रहो
 हो मेरी गुडिया सी
पराये देश में हो
अनजान रहना इस
घर में हो जैसे मेहमान।
मेरी प्रियतमा ... मेरी
प्रिय हो तुम बिलकुल
बचपन में खेल कर
तोड़ डाली उस
गुडिया सी ...
मेरी गुडिया तुम
हमेशा मेरी गुडिया
की तरह ही रहना।
नहि……….
मैं अब गुडिया नहीं
पापा से मुझे कुछ
चाहिए नहीं ...
भाई पे मेरा हक नहीं
... साथी तुमने भी
मेहमान कह कर
घर में एक कोना
तक तो दिया नहीं
एक कोना मेरा अपना
जिसको कह सकू
मैं अपना ... जहाँ बैठ
लिख सकू मैं अगले
जनम में हो जो
पूरा वो सपना
गुडिया हुई, गुडिया
तोड़ी गई, गुडिया
से खेला .... समझो मुझे
में गुडिया नहीं
हाँ मैं अब गुडिया नहीं
है मेरा अपना वजूद
मेरी दुनिया ... तुमसे
तुम्हारे सरनेम से
अलग मेरा नाम है
हाड मांस है ,  लहू का
रंग लाल है , मांसपेशिया
मजबूत है , मन मस्तिष्क
है ..... हाँ मेरा नाम कुछ
तो है ... हां मेरा नाम नारी है।

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