ओ... धरती के लाल रे ...
सामंती सरकार के कोप के भांजे रे
तुम भी टूटे होकर जार जार
हम भी बिखरे होकर बेजार रे
इन्दर न बरसा मेघा न बरसे
तेरे आंसुओ से तड़क रहा
धरती माँ का सीना रे ...
ओ... धरती के लाल रे
ओ... धरती के लाल रे
सूखा पड गया पड गया अकाल रे
तुम्हारी इस दुर्दशा पर ओ ‘अन्नदाता’
रो देता है महाकाल रे ...
लोकतंत्र ताक रहा अगल-बगल झाँक रहा
आजादी मिली यहाँ किसको रे
तू तो रहा सदा गुलाम ही सा
आत्महत्या’ को हुआ तू मजबूर रे
ओ... धरती के लाल रे
ओ... धरती के लाल रे
तेरे सपनो के महल तुने बोये थे खेत-खेत
फसल आई तो तू हुआ बर्बाद रे
धमकियों से न बिकने दी तेरी फसल
कब से तू रो रहा इस सरकार के माथे रे
जमीन , जंगल , जल हड़प करने को
ऋण ले लिया करने फसल तैयार रे
अब दब गया लगान के बोझ तले
ओ... धरती के लाल रे
ओ... धरती के लाल रे
जमीन तेरी हड़प करने को
ये सरकार चल गयी निर्लज्ज चाल रे
ना मिला तुझे उचीत मुआवजा
ना मिली कोई ऋण में राहत रे
बाँध पोटली उठा गठरिया
तेरी जमीने नीलाम करने
की हो गई है तैयारी रे
ओ... धरती के लाल रे
गिरवी रख दिए अपने वंश के लाल तुने
बर्बादी पर जश्न मना रही ‘महारानी सरकार रे
तुझे ‘आत्महत्या’ को उकसाया जिसने
कैसा ये ‘सुराज’ तू लाया रे
बूँद-बूँद को तरस गया
लहलहाता खलियान रे
हरियाली के साथ-साथ
मर गया तेरा सारा होसला रे
ओ... धरती के लाल रे ....
ओ... धरती के लाल रे
ओ... धरती के लाल रे
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