बुधवार, 8 जून 2016

पाक पगडण्डी पर चलो तुम ....

पाक पगडण्डी पर चलो तुम  .... 

पाक पगडण्डी पर 
चलो तुम जलते अंगारों पर 
हाँ क्योंकि पसंद है मुझे 
लेना इम्तिन्हान तुम्हारा 
तुम चंचला, तुम लक्ष्मी, तुम नारी 
सुना है एक जगह कभी न ठहरी 
 तो बनाये मैंने ये पायल-तगड़ी 
और बनायीं तिजोरी घर नाम की 
जहाँ रखा हमेशा निगेह-बां तुम्हे 
तुम पर राखी सिन्दूर की बंदिशें 
और दी मेहँदी की बंदिशे ताकि 
न दिखा करें तुम्हारे लहू लुहान 
हथेली की रेखाएं जो रंग ली 
तुमने अपने ही अरमानो के खून से 
पहन दी चूड़ी कांच की ताकि 
चटक के टूटने की आदत हो 
रहे तुम्हे ... फिर जब तोडा 
जाये तुम्हारा वजूद बिखेरा 
जाये कर चूर चूर न हो तुम्हे 
रंज उस आवाज़ से और तुम 
कहो अपने ही रेट रटाये 
साज से "किस्मत मेरी "
न ले सको नाम तक तुम 
अपना ... दिया है मैंने नाम 
अपना अब इससे ही जपो, तपो 
ये ही तो बची है अब पहचान तुम्हारी 
लाख जतन अब तुम करो 
नहीं दिखा सको तुम खार पानी 
सपनीली आँखों का, सजा लो 
इनमें काजल मेरी जवानी का 
और हो रहो ता-उम्र अंधी 
सिर्फ और सिर्फ मेरी हो रहो 
न दिखे फिर सपने में भी 
राजकुमार कोई तुम्हारी 
बचपन की कहानी का।
पाक पगडण्डी पर ....
चलो तुम जलते अंगारों पर 
हाँ क्योंकि पसंद है मुझे 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें