बुधवार, 8 जून 2016

कब्र की माटी सी ... औरत

कब्र की माटी सी ... औरत

कब्र की माटी
जब जो मेहमान आये
देती है फैला
दामन खुद का
जग की ठुकराए
हो, या नाजो पले
आते ही है इक दिन
कब्र की माटी तले
मिलता है सुकून
बिन ये ख्याल किये
की, था कौन मुझसे
पहले का मेहमान
ख़त्म हो जाते है
सारे शिकवे गिले
बिखर कर चूर हो जाता है
अभिमान, शान से
सब का एक हो जाता
मान, राज हो या रंक।
कब्र की माटी
लेती लिटा सबको
बिना किसी ख़याल
देती स्नेह तब तक
न हो जाता माटी
का पुतला उस जैसी
माटी .....
और जब तक न हो
नसीब कब्र का साथ
देती है माटी बन
औरत ... इस माटी
के पुतले का
यु ही कब्र की माटी सी
औरत, करती है
दफ़न हर जुर्म उसका
अपने आँचल तले
करती है पोषण उसका
जो करता हर पल
शोषण उसका, दोहन
करता आंसूओ का
दूध पीकर मजबूत
मांसपेशियों की अकडन
करता लचीली
मटियामेट कर देह उसकी
औरत तू कब्र की माटी
सी है।

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