बुधवार, 8 जून 2016

तलाश जिंदगी की दूसरी जमीन की .....( katran kitab ki )

 तलाश जिंदगी की दूसरी जमीन की .....( katran kitab ki )


.....  कन्या से लड़की बनी नहीं की घर का कोन कोन नसीहते देने लगता है,
... पिता ... कॉलोनी के लडको से कम बात किया करो। अब बड़ी हो गई हो
मोसेरे भाइयों से थोडी दूरी रखो, अब तक तो उनके साथ खूब खेल चुकी बचपन से
आँख मिचोनी , पक्दम पकडाई , विष-अमृत .... अब तुम्हारी उम्र नहीं की तुम
इनके साथ खेलो,  बनाओ कोई देखे तो क्या कहेगा .... .....
क्यों ??? ........ क्या हुआ पापा ....... फिर किसके साथ खेलु ....
स्कूल  किनके साथ जाऊ ... अकेली ... अकेली ... क्या करू .......!  और फिर
हम तो बचपन से साथ साथ खेलते आये है सभी अब क्या हुआ ........ में तो
खेलूंगी ... सब से बात  ये क्या बात   भाइयों से ही न बोलू , बड़ी अजीब
अजीब सी बात कर रहे हो पापा .... आपको समझना बहोत ही मुश्किल है .....
.... देख बेटा जो कहा वो मानो ....   स्टेडियम जाने का टाइम हो रहा है,
... जाओ ... टीम तुम्हारा इन्तिज़ार करती होगि….
जी पापा , ओके ....  बाय ... ...
........... ये कैसी जिंदगी देना चाहते हो आप इसको ... ये लड़की बिचारी
है  पापा बहोत  आधुनिक है , कान्वेंट में पढ़ा रहे है , स्टेडियम में भेज
रहे है, और दूसरी ओर ........... समझ से परे इनकी मानसिकता को ये ही जाने
..... खैर ये लड़की  बिंदास है, अपने नाम के अनुसार ...  बोल्ड है, भाई
बहन का भेदभाव नहीं जानती नहीं मानती , मस्त खुद भी ... स्कूल से घर आकर
कभी पूरे कपडे पहने हो  याद नहीं, बढ़ रही थी ताड़ की तरह मैं दूर से देख
देख कर मुस्कुराती ... क्या मस्त जीव है ये लड़की, टॉम बॉय तो कैसे कहु
लम्बे लम्बे काले घने रेशमी बाल, पतली दुबली सुंदर सुघड़ काया, बोले तो
फूल झरे, आवाज़ तो हरे कांच की चूड़ियों सी खनखनाती,  तो जानती ही नहीं,
नाक देखने में सुघड़ पर, गुट्टी सी, उस पर तिल ... उस टिल पर किसी मक्खी
को नहीं बैठने दिया उसने ......... आत्म-ज्ञानी, स्वाभिमानी और सर्वगुण
सर्वगुण सम्पन्न ............. जितनी तारीफ़ करो कम .... खैर अब ये अचानक
बड़ी हो गई, इस पर पाबंदियां जैसे जैसे बढ़ रही थी वैसे वैसे  मुस्कान
उदासियों में बदल रही थी, फिर भी चेहरा खिला खिला ही दीखता, कॉलेज जाती,
टाइम पर  टाइम पर आना, शाम का चूल्हा चोका, बर्तन और फिर बीच बीच में
अपनी बड़ी बहन के बच्चो का पालन पोषण , भी उसके जिम्मे हमेशा नहीं लेकिन
हाँ बड़ी बहन ससुराल में कम और पीहर में जियादा रहती थी, ख़ास कर तब जब
बच्चे बहोत  ठी एक के बाद एक जैसे उसके सर माथे पैदा कर लिए हो , अब वो
खेलना , गप्पे मरना , सब भूल बैठी थी ... पढ़ रही थी , बस खुद के हिस्से
में तो एक ही काम कर रही थी पढ़ रही थी , रात बा-रात कभी आँख बीच में खुल
जाती तो उठ कर देखती उसकी खुली खिड़की के पास रखा लैंप जलता ही दीखता,
सुबह सुबह नहा कर , मंदिर जाती तो , बड़ा आश्चर्य होता कैसे कर लेती है
ये अभी से .......... खैर वक़्त ....   गुजरता गया कॉलेज से यूनिवर्सिटी
तक आते आते उसके लिए रिश्ता ढूँढा जाने लगा ,  सही बात है .. ये तो होता
ही है ... लड़की के लिए दूसरी जमीन ढूंढी जाती ही है, ... जिंदगी के लिए,
जिने के लिए या मरने के लिए ये सब तो एक जुआ है ..... लग गया तो जिंदगी न
लगा तो मौत वो भी साक्षात हर पल की .... घिसे , हल्दी के निशाँ वाले
आरामदायक गाऊन पहनती  थी घर में, फिर भी सिन्द्रेल्ला सी खूबसूरत लगती ,
प्यारी तो थी ही, कोई भी कैसा भी काम बता दो वो करती , चाहे घर में कोई
नाराज हो  वो बहार किसी को किसी काम के लिए मन नहीं करती, सिलना हो या
बीनना चुन ना , किसी आंटी को तेल सर मे मालिश करवानी हो या कुछ मंगवाना
हो वो हमेशा फुर्ती से मदद करवाती .......
एक दिन सुबह सुबह देखा ...... वो रोये जा रही थी, मुह फुला कर जैसे रोष
जाता रही हो .... पता नहीं क्यों .... फिर .... पता चला
उसको देखने आने वाले है ... मैंने इशारे से  बुलाया पुछा क्या हुआ क्यों
रो रही  हो
कुछ नहीं भाभीजी .......... . कोई देखने आ रहे है ...
...अरे तो रोने की क्या बात है .... ???
नहीं ...... कुछ नहीं
फिर भी बता तो ...... क्यों रो रही है… ... बता तो .. .....भाभी आज कोई
देखने आने वाले है, ..... सुना है, ये वो परिवार है जिसने मेरी एक बहा को
बहोत बुरी मौत दी थी ,...... कई बरसों पहले .... तो क्या अब उस्सी घर में
रिश्ता करना ठीक होगा ...
.... अरे तो तू मन कर दे '
... किया था ... पापा बोले ."..... जुबान बंद रखो .... तुम कोन होती हो
ये सब सोचने वाली .... हम मर नहीं गए .... हम सब देख लेंगे .......... एक
बात वो तुझे पसंद करे तो ......."
अरे तेरे पापा तो बहोत मॉडर्न है फिर ऐसी बात आज के ज़माने में ..... चलो
कोई नहीं एक बार देख आओ क्या पता ... तुम्हे लड़का पसंद आजाये .... जा ..
रो मत ...
ठीक भाभी .... कह वो चली गई, ... ... बात आई गई दिमाग में घर का काम काज
घूमने लगा, चक्कर घिरनी सी काम निपटाया .. पता है नहीं चला कब रात हो गई,
दुसरे दिन उठी तो ये क्या .... अरे ...ये .. सामने वाले घर में आज क्या
है, भई , ... ये बोले तुम्हे नहीं पता तुम्हारी दोस्त की सुबह सगाई और
शाम को गोद भराइ ..(रिंग सेरेमनी ) है, आज तो खानावाना बनाने की ज़रूरत
ही नही रविवार भी है, चलो ये ठीक किया , इन्होने दोनों वक़्त की दावत और
वो भी सन्डे को ..... पर मुझे बता अटपटा लगा ... कल लड़की देखि , आज
सगाई, गोद , रिंग ... ....ऐसे तुरत फुरत ... देख भाल तो लेते ... अरे ...
अगले महीने शादी फिक्स कर दी ... चलो अब  हो जाओ .. चलते है,... ठीक है….
....
......... दो दिन बाद वो घर से निकली मेरे पास आई .... मैंने पुछा क्या
हुआ ,  सब ठीक  ही रहा न , कैसे है तेरे होने वाले साथी हमने तो कल  में
बहोत देखने की कोशिश की मगर .....  जिसकी तरफ इशारा कर के बता रहे थे वो
तो मुझे लगा नहीं की वो ही तुम्हारे जीवन साथी होंगे ........
हहहह्हाहः ........  जोर से हस्सी वो ठहाका मार कर ... की में तो घबरा गई,
....... भाभी ..... कल जब मुझे चाय लेकर दिखाया गया, तब वहां ६ - ७ लोग
बैठे थे साथ में दादाजी, दादीजी, पापा, मामाजी और जियाजी और चाचाजी भी थे
कमरा ठसाठस भरा था, ..... उन सब के बीच वो इंसान कोनसा था, मुझे नहीं
पता, चाय की ट्रे ही , ये
डिक्लेअर हो गया जी ठीक है, कल सगाई और गोद भारी साथ साथ ..........सब उठ
कर चले गए ... मैं ... मैं तो देख भी नहीं पी वो इंसान कोन  है , कैसा
है, ........ बस ...
.... पागल है क्या तू .... एम् ए पास है, ...... फिर  हाँ क्यों की .....
बता .......
क्या .. बताऊ .... पुछा ही नहीं , किसी ने , न दीदी ने , न भाई ने , न
भाभी ने , ......... ........
....और कल सगाई में , रिंग सेरेमनी में ...............
 ....... भाभी आप भी न ..... देखा नहीं था  भारी साडी पहनाई थी, और ये एक
हाथ लम्बा घूँघट ..... पापा ने ये कह कर  था की ससुराल वालो को पसंद नहीं
लड़की का खुले सर भीड़ में आना ...... तो ... तो मैंने  रिंग पहनाई ....
यार मुझे क्या पता ... घूँघट मेंसे कुछ नहीं दिख रहा था ..............
.......... अरे भगवान् तुम से हम बंगाली अनपढ़ औरत ही ठीक ..... तुम्हारे
भैया से बहोत देर तक बात किये जब ये हमे देखने गए थे तुम कैसे लोग हो ..
.....
......... क्या करती भाभी ... पापा के आगे .......
.चल अब तो शादी पक्की हो गई ... गीत चाव भी शुरू हो गए ....  चार दिन बाद
..खूब  देख लेना जी भर भर कर अपने दुल्हे को ......और वो हंस दी ... हा
आहा आहा हा उसका अट्हाहास किसी बुरे व्यंग्य बाण से कम न था .... फिर उठ
कर बोली चलो भाभी अब जाती हु ....  देखा आँखों में आंसू आ गए दोनों के वो
आंसू पोंछती अपने घर   गई,.......
......... शादी की तैयारियां होने लगी,
.....उसके बाद देखा पास के खाली नए मकान को खुलवाया गया,  शादी का
,फर्नीचर, गाडी, टी . वि . फ्रिज , दूकान भर बर्तन,  ताम्बे , कांसे ,
पीतल,  स्टील के बर्तन ... मेलामीन डिनर सेट,.... सुई धागा, महंगे महंगे
कपडे , दुल्हन के सेट जेवर,  मेक अप का सामान सब जैसे जैसे ख़रीदा जाता
उसके बाद देखा पास के खाली नए मकान को खुलवाया गया,  शादी का ,फर्नीचर,
गाडी, टी . वि . फ्रिज , दूकान भर बर्तन,  ताम्बे , कांसे , पीतल,  स्टील
के बर्तन ... मेलामीन डिनर सेट,.... सुई धागा, महंगे महंगे कपडे , दुल्हन
के सेट जेवर,  मेक अप का सामान सब जैसे जैसे ख़रीदा जाता मुझे बुला कर
दिखाया जाता , में भी सामान के  साथ उसकी  हुयी सेहत की भी  कर आती
.... वो हस  देती ...... भाभी  पापा से , मम्मी से , आपसे , इन् छोटे
छोटे बच्चो से जिनके साथ  खेलती थी , दूर होने का सोच कर भी रूह कांपती
है  ....
हाँ भाभी लेकिन मुझे  नहीं लग रहा मेरी  है ......
क्यों .... रे ...? पागल
......... हाँ भाभी ऐसा लगता है जैसे पापा मम्मी अपने खिलोनो की गुडिया
की शादी कर रहे हो जैसे, जो न  है न कुछ  कहती है,बस जैसे जैसे वो करना
चाहते है वो करती जा रही है ,  कोई दूसरा रास्ता भी नहीं , ..........
गुडिया को शादी की अग्नि परीक्षा तो

चल हट .... ऐसे नहीं कर ..... सब अच्छा ही होगा ...
हाँ भाभी लेकिन मुझे  नहीं लग रहा मेरी  शादी  है ......
क्यों .... रे ...? पागल
......... हाँ भाभी ऐसा लगता है जैसे पापा मम्मी अपने खिलोनो की गुडिया
की शादी कर रहे हो जैसे, जो न  है न कुछ  कहती है,बस जैसे जैसे वो करना
चाहते है वो करती जा रही है ,  कोई दूसरा रास्ता भी नहीं , ..........
गुडिया को शादी की अग्नि परीक्षा तो  .... देनी ही पड़ेगी ....

चल हट .... ऐसे नहीं कर ..... सब अच्छा ही होगा ...
... हाँ शायद ...... नहीं भी हुआ तो क्या ..... ?

शादी का दिन आया , न पार्लर किया न  श्रृंगार ही किया, उदास थी , आँखें
हर पल पनीली , जब स्टेज पर आई दुल्हन के लिबास में, भोला चेहरा मासूमियत
से पिघल पिघल कर आंसू बन अविरल बह निकले , धक् से रह गई , स्टेज पर अधेड़
उम्र का दूल्हा देख, .... पहली बार ... उसने उस भीड़ में मुझे देखा, इतने
में वरमाला लिए सहेलियों ने उसे घेर लिया , दोस्तों के हुजूम ने    लिया
,  उसके दोस्तों की आँखों से अविरल आंसू बहने लगे ... घर , कालोनी के लोग
सकते में पड गए ये ये क्या है ...... ऐसा मेल ....छि ..... दोस्त बिना
खाना खाए वापस हो लिए, जिन घरो की जलपरी थी , आँखों का तारा थी , वो लोग
बुरी तरह हताश हो गए ऐसे दुल्हे को देख ... सब की जुबान पर एक ही ताना
... इस से बढिया तो गला ही दबा देते इस हस्ती खेलती का ... या कुवारी ही
रह लेने देते कमा खा लेती .....
......  खैर अब क्या हो सकता था , सुना  था बड़ी बहन ने करवाया ये रिश्ता
, ...तो क्या कोई दुश्मनी थी अपनी छोटी बहन से ,...... या जलन ... राम
जाने लेकिन उसका तो जीवन ..... जाने क्या होगा , कैसे रहेगी इस के साथ ,
स्टेज पर सिमटी , सकुचाई सी , आंसूओ से तरबतर ..... किसी बुजुर्ग महिला
ने वहीँ डांट दिया उसको ... चुप हो जा .... कोई क्या कहेगा सारे पैसे पे
पानी फेरेगी , देखती नहीं तेरे पापा ने कितना पैसा बहाया है ..... सुभ
विदाई के समय में उसके पास गयी वो तब तक रोये जा रही थी , माँ को कहे जा
रही थी , मम्मी मुझे तेरे पास ही रख ले , नहीं भेज , नहीं भेज मम्मी ...
मम्मी क्या करती ... वो समझती सब थी मगर कर कुछ नहीं सकती थी , ... नहीं
बेटा  ऐसे मत कर , अब तो जाना ही है, .... और उसको विदा कर सब घर वाले
दुसरे दिन उसके आने तक रोते ही रहे ..... में परेशान थी ये कैसी शादी
...... मेरी समझ से परे था ......... CONT.

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