उस चिड़िया का किस्सा : उस चिड़िया का नाम : एक चिड़िया
Episode :2
. बच्चे बड़े
हो गए ठी दूर उड़ान पर निकल जाते ठी अब, अपने दो पखो पर उड़ना सिखा दिया था एक समझदार माँ ने, उड़ते उड़ते कही
दूर निकल गए तो फिर लौट कर न आये माँ का हाल पूछने ..........बेबस सक्षम थी हर काम में मगर रिश्तो ने आहात
कर दिया था, हिम्मत नहीं हारी
वो ही रोजमर्रा चल रही थी जिंदगी को नियम से जिया अब नियम उसकी जिंदगी बन गया था, ये देख मेरा मन
दुखी हो जाता, लगता था इंसानी फितरत को कोसा करती हू यहाँ तो पक्षी भी...... ! मन ही मन चार चार शादियाँ रचाने वाले अब्दुल की
पहली बीवी का मुरझाया चेहरा ,वक़्त से पहले पड़ी
झुर्रियां, ....फिर दूसरी का आना और कुछ दो ही साल बाद उसके नूर का फीका
पड़ना.....
...अब्दुल को तीसरी लाने का बहाना बना, ....अति तो तब हो गयी जब तीसरी का न औलाद होना....छोटी के आने का बहाना बना..... ! जहाँ देखो यही एक काम है..सब की एक ही धुरी ..वासना, भावनाओ का सौदा, परिस्थितिटन से समझोता कर दिल प् चट्टान सा बोझ लिए जीवन धोने की मजबूरी..... क्यों, अब्दुल ही क्यों, पास वाले राम सिंह जी ने क्या कम की मीना कुंवर के साथ, अपने राजपूती चेहरे पे घमंड करने वाली को जब पता चला की सोलह की बियाह कर आई तब से कब छत्तीस पार कर गई पता ही न चला, पोलिसे की नौकरी की दुहाई दे रामसिंह कहते चौमासे ही आता, उस्सी में दो लडको से झोली भर दी थी उसकी. वो बच्चो को पालती, घर सम्हालती, अब तो नौकरी भी जाने लगी थी, जब से नौकरी जाने लगी थी राजपूतनी से न जाने क्या बन गयी थी रंग ढंग बदल गए थे राजपूतनी से उसके, उसके राजा रामसिंह जी को कोई मतलब नहीं था, होता भी क्यों जब तक मीना कुवरानी को समझ आई तो पता चला पति देव सालो से गाँव में अपने खाने पीने इन्तिजाम के साथ और भी इंतजाम किये है, तभी जवान राम सिंह जी कभी ३ तो कभी ६-६ महीने उसकी सुध नहीं लेते! हाँ तनख्वाह टाइम पे बैंक में ५०% की रेट पे ट्रान्सफर कर देते है, हो भी क्यों न ५०% की ही भागी दार थी वो! चिड़ा भी ५०% का सौदा करने आया था, चिड़ी खुद्दार थी ऐसे कैसे अपनी जान का सौदा करती... ..चिड़ा रोज़ दूसरी चिड़ी के साथ आता, घोंसले में बैठी चिड़ी से हल्का हल्का संवाद करने की कोशिश करता, चिड़ी दूर जा बैठ टी, फिर चिड़ा अपने दोनों पंख फैला कर घोंसले में बैठ जाता, सीडी भी मौका पाते ही जा घुसती अपने घोसले में, मुझे लगा चिड़ा दोस्ती डालने की या कहू चिड़ी को बहला-फुसला कर घर से निकल जाने को मन रहा हो, नहीं हरगिज नहीं करना ऐसा....मैंने मन ही मन कहा चिड़ी ने जैसे मेरी मौन समझाइश को गाँठ बाँध लिया था...गुस्सा फूट पड़ा, ची ची ची ची से चिड़ी ने पूरा घर सर पर उठा लिया. चिड़ा बदतमीजी पर उतर आया, एक बेगानी चिड़ी के लिए उसने चिड़ी से ची ची ची की बहस के चले दुसरे दिन तो चोंच से हमला बोल दिया, उसके पंखो पे हमला करता, मनो पर काट देना चाहता हो, चिड़ी ने बराबर सामना किया, दुनिया का ठेकेदार आराम करने जाने लगा, ये बूढ़ा सूरज हम सब की जीवन यात्रा का गवाह सदियों से अपनी बेटी के दर्द को सीने में दफ़न कर चला जाता है, कलेजा नहीं पसीजता इसका, फिर सोचती हूँ, दुनिया की रीत को निभाना पिता की मजबूरी ही तो हा वरना अपने गुस्से की गर्मी से क्या ऐसे आन्याई को जला कर राख न करदे, उसकी कोमल चंपा-चमेली-छुईमुई को यु ही काल के हाथो मसलते कुचलते थोड़े ही देख सकता है, लेकिन .....मजबूर पिता के सामान ये सूरज पलके झुकाए चिड़ी की हालत पे बेबस हो अस्त थोड़े हो सकता था....पर .....संध्या को भी सम्हालना था! सूरज अस्त हो गया था चिड़ा सौतन के साथ न मालुम कहाँ उड़ गया , लड़ झगड़ कर, मारपीट मचा कर......चिड़ी बेसुध , बदहवास सी आँखे मूँद न जाने क्या सोच रही थी, पलके मूँद लेने को नींद कैसे मन लेती उसकी आँखों के कोए लगातार घूम रहे ठी, कुछ सोच रही थी, वो में भी बचो को खाना खिला बर्तन साफ़ कर, कपडे बदल जा लेती बिस्टर पे कब पलके मूंदे सोचते सोचते नींद आगे, सुबह अपनी दिन-चरिया में मशगूल हो गई सोचती रही चिड़ी का अस्तित्व और अस्मिता दोनों दांव पे लगे है क्या करेगी ...मर जाएगी ये कैसे सहन करेगी इतना दर्द.....हे भगवन उसको हिम्मत दे..जीवन दिया है जीने के लिए एक साथ भी दे....
...अब्दुल को तीसरी लाने का बहाना बना, ....अति तो तब हो गयी जब तीसरी का न औलाद होना....छोटी के आने का बहाना बना..... ! जहाँ देखो यही एक काम है..सब की एक ही धुरी ..वासना, भावनाओ का सौदा, परिस्थितिटन से समझोता कर दिल प् चट्टान सा बोझ लिए जीवन धोने की मजबूरी..... क्यों, अब्दुल ही क्यों, पास वाले राम सिंह जी ने क्या कम की मीना कुंवर के साथ, अपने राजपूती चेहरे पे घमंड करने वाली को जब पता चला की सोलह की बियाह कर आई तब से कब छत्तीस पार कर गई पता ही न चला, पोलिसे की नौकरी की दुहाई दे रामसिंह कहते चौमासे ही आता, उस्सी में दो लडको से झोली भर दी थी उसकी. वो बच्चो को पालती, घर सम्हालती, अब तो नौकरी भी जाने लगी थी, जब से नौकरी जाने लगी थी राजपूतनी से न जाने क्या बन गयी थी रंग ढंग बदल गए थे राजपूतनी से उसके, उसके राजा रामसिंह जी को कोई मतलब नहीं था, होता भी क्यों जब तक मीना कुवरानी को समझ आई तो पता चला पति देव सालो से गाँव में अपने खाने पीने इन्तिजाम के साथ और भी इंतजाम किये है, तभी जवान राम सिंह जी कभी ३ तो कभी ६-६ महीने उसकी सुध नहीं लेते! हाँ तनख्वाह टाइम पे बैंक में ५०% की रेट पे ट्रान्सफर कर देते है, हो भी क्यों न ५०% की ही भागी दार थी वो! चिड़ा भी ५०% का सौदा करने आया था, चिड़ी खुद्दार थी ऐसे कैसे अपनी जान का सौदा करती... ..चिड़ा रोज़ दूसरी चिड़ी के साथ आता, घोंसले में बैठी चिड़ी से हल्का हल्का संवाद करने की कोशिश करता, चिड़ी दूर जा बैठ टी, फिर चिड़ा अपने दोनों पंख फैला कर घोंसले में बैठ जाता, सीडी भी मौका पाते ही जा घुसती अपने घोसले में, मुझे लगा चिड़ा दोस्ती डालने की या कहू चिड़ी को बहला-फुसला कर घर से निकल जाने को मन रहा हो, नहीं हरगिज नहीं करना ऐसा....मैंने मन ही मन कहा चिड़ी ने जैसे मेरी मौन समझाइश को गाँठ बाँध लिया था...गुस्सा फूट पड़ा, ची ची ची ची से चिड़ी ने पूरा घर सर पर उठा लिया. चिड़ा बदतमीजी पर उतर आया, एक बेगानी चिड़ी के लिए उसने चिड़ी से ची ची ची की बहस के चले दुसरे दिन तो चोंच से हमला बोल दिया, उसके पंखो पे हमला करता, मनो पर काट देना चाहता हो, चिड़ी ने बराबर सामना किया, दुनिया का ठेकेदार आराम करने जाने लगा, ये बूढ़ा सूरज हम सब की जीवन यात्रा का गवाह सदियों से अपनी बेटी के दर्द को सीने में दफ़न कर चला जाता है, कलेजा नहीं पसीजता इसका, फिर सोचती हूँ, दुनिया की रीत को निभाना पिता की मजबूरी ही तो हा वरना अपने गुस्से की गर्मी से क्या ऐसे आन्याई को जला कर राख न करदे, उसकी कोमल चंपा-चमेली-छुईमुई को यु ही काल के हाथो मसलते कुचलते थोड़े ही देख सकता है, लेकिन .....मजबूर पिता के सामान ये सूरज पलके झुकाए चिड़ी की हालत पे बेबस हो अस्त थोड़े हो सकता था....पर .....संध्या को भी सम्हालना था! सूरज अस्त हो गया था चिड़ा सौतन के साथ न मालुम कहाँ उड़ गया , लड़ झगड़ कर, मारपीट मचा कर......चिड़ी बेसुध , बदहवास सी आँखे मूँद न जाने क्या सोच रही थी, पलके मूँद लेने को नींद कैसे मन लेती उसकी आँखों के कोए लगातार घूम रहे ठी, कुछ सोच रही थी, वो में भी बचो को खाना खिला बर्तन साफ़ कर, कपडे बदल जा लेती बिस्टर पे कब पलके मूंदे सोचते सोचते नींद आगे, सुबह अपनी दिन-चरिया में मशगूल हो गई सोचती रही चिड़ी का अस्तित्व और अस्मिता दोनों दांव पे लगे है क्या करेगी ...मर जाएगी ये कैसे सहन करेगी इतना दर्द.....हे भगवन उसको हिम्मत दे..जीवन दिया है जीने के लिए एक साथ भी दे....
......आखिर बुराई का घड़ा फूटना ही
था, औरत भी कब तक सहे,कितना सहे, क्या क्या सहे और क्यों सहे ??? सिर्फ
इसीलिए की वो नाजुक है...तो क्या वो अपनी नजाकत छोड़ सकती है, अपनी खुदी कोमिटा
दे, मिटा देगी तो फिर माँ माँ न रहेगी, बाहें प्यार न
देगी, तरस जाओगे वात्सल्य और ममत्व को, औरत औरत न रहेगी
तो ये दुनिया नरक से बदतर कुछ न बचेगी.....
.... ....एक दिन अब्दुल जब ५वि को लाने की
तैयारी में था उसके साथ गुल-छर्रे उडाता, थियेटर जाता, शहर के बाग़ बागीचों में हाथो में हाथ डाले घूमता, चाट के खोमचे पे चाट खाते आस पड़ोस के लोग जब तब
देख आते, देख आते, आकर उसकी चारो बीवियों को बता जाता, बता ते की मूह चिढाते, मजे लेते मखोल बना चल देते...चरों के सीने पे
सांप लोट जाते, फिर एक दुसरे को ऐसे देखती मानो मन ही मन पचता रही हो, की सखी मैंने भी अब ही जाना सौत के आने का
दर्द.........न जाने जिंदगी ने कोनसा फलसफा पढ़ा दिया था, चारो की आँख में पछतावे का पानी.....फिर सूख कर
बदले की आग बन गया, ठान लिया चारो ने कुछ... यही कब तक सहेगी औरत, कब तक ये दादागिरी , पहले पत्नी फिर सौतन और फिर एक्स-बीवी या
एक्स-सौतन या एक्स-गर्लफ्रेंड होना कितना बदनुमा धब्बा है या कहू गाली है......गली
है औरत का सौतन होना सौतन होकर जीना, ठान लिया था परवीन बनो ने बड़ी होने के नाते आज आने दे अब्दुल को अपन देखते है
कैसे लाता है उस रईसा को हमारी सौत बनाकर, अल्लाह कसम आज उसकी खाई नि...! शाम को
अब्दुल घर आया तो साथ लाल लिबास पहने रईसा भी ले आया, रईसा को दरवाजे से
बहार खड़ा कर दिया चारो ने और अब्दुल को भीतर बुलाया ...........हाय क्या हुआ या अल्लाह ......पड़ोसियों ने हो हल्ला सुन, बीच बचाव से अब्दुल को बहार निकला आधी रात को
हॉस्पिटल पहुचाया, सुनने में
आया हा चारो हाथ पैरों में फ्रक्चर हो गए,
.....आखिर बुराई का घड़ा फूटना ही था, औरत भी कब तक सहे,कितना सहे, क्या क्या सहे और
क्यों सहे ??? सिर्फ इसीलिए की वो नाजुक है...तो क्या वो अपनी नजाकत छोड़ सकती है, अपनी खुदी कोमिटा दे, मिटा देगी तो फिर माँ माँ न रहेगी, बाहें प्यार न देगी, तरस जाओगे वात्सल्य
और ममत्व को, औरत औरत न रहेगी तो
ये दुनिया नरक से बदतर कुछ न बचेगी..... ....एक दिन अब्दुल जब ५वि को लाने की तैयारी में था उसके साथ गुल-छर्रे
उडाता, थियेटर जाता, शहर के बाग़
बागीचों में हाथो में हाथ डाले घूमता, चाट के खोमचे पे
चाट खाते आस पड़ोस के लोग जब तब देख आते, देख आते आकर उसकी
चारो बीवियों को बता जाता, बता ते की मूह चिढाते, मजे लेते मखोल बना चल देते...चरों के सीने पे
सांप लोट जाते, फिर एक दुसरे को ऐसे देखती मानो मन ही मन पचता
रही हो, की सखी मैंने भी अब ही जाना सौत के आने का
दर्द.........न जाने जिंदगी ने कोनसा फलसफा पढ़ा दिया था, चारो की आँख में पछतावे का पानी.....फिर सूख कर
बदले की आग बन गया, ठान लिया चारो ने कुछ... यही कब तक सहेगी औरत, कब तक ये दादागिरी , पहले पत्नी फिर सौतन और फिर एक्स-बीवी या
एक्स-सौतन या एक्स-गर्लफ्रेंड होना कितना बदनुमा धब्बा है या कहू गाली है......गली है औरत का सौतन होना सौतन होकर
जीना, ठान लिया था परवीन बनो ने बड़ी होने के नाते आज
आने दे अब्दुल को अपन देखते है कैसे लाता है उस रईसा को हमारी सौत बनाकर, अल्लाह कसम आज उसकी खैर नि...! शाम को अब्दुल घर आया तो साथ लाल लिबास
पहने रईस भी ले आया, रईस को दरवाजे से बहार खड़ा कर दिया चारो ने और
अब्दुल को भीतर बुलाया .......हाय क्या हुआ या अल्लाह ......पड़ोसियों ने हो हल्ला
सुन,
बीच बचाव से
अब्दुल को बहार निकला आधी रात को हॉस्पिटल पहुचाया, सुनने में आया हा
चारो हाथ पैरों में फ्रक्चर हो गए, साल दो साल तो लग ही जायेंगे ठीक से चल फिर पाने में.. चारो बीवियां घर
में कशीदे का काम करने और लाख के कंगन बनाने में सिद्धस्त थी ! सुख से जीवन चलने लगा .......
very nice story
जवाब देंहटाएंthanks Saifuddin Saify ji ...
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