सामजिक
सरोकार .
उत्तराखंड
त्रासदी ......
आदरनीय मित्रो
उत्तराखंड
-
बदरीनाथ
,
केदारनाथ
में प्रकृति ने जो तांडव मचाया,
इस
हादसे को देशवासी नहीं भूल
सकते। कई हजार लोगो ने अपने
अपनों को हँसते हँसते तीर्थ
यात्रा भेज था और उम्मीद की
थी की सब हंसी ख़ुशी लौट आयेंगे
,
हमेशा
की तरह,
मगर
...
इस
बार त्रिकाल को कुछ और ही लीला
सूझी और उसने अपने भक्तो को
अपना रौद्र रूप दिखा ही दिया। कई
हज़ार लोग लापता और कई हज़ार लोग
बे-वक़्त
मौत के हवाले। इन मरने वालो
में .....
नौ-जवान
सबसे जियादा है,
फिर
प्रौढ़ और यहाँ तक की छोटे छोटे
मासूम बच्चे और दुध्मुहे बच्चे
तक शामिल है। हम
इसके लिए समय को दोष दे,
या
प्रकृति को या कहे कुछ भक्त भगवान्
को इतने भा गए की उन्होंने
उनको हमेशा हमेशा के लिए अपने
पास बुला लिया,
मगर
......हकीकत
.................
??? हकीकत
ये है की -------------
------मेट्रो
की चाल चलता जीवन,
रुपैये
के ढेर पर सोता इंसान,
नींद
को तरसती कॉल सेंटर्स में कमर
तोड़ म्हणत करते युवा , जिंदगी
शहरी जीवनशैली ,
भौतिकतावादी
संस्कृति और सबसे बड़ी बात मानव
का अति-अपेक्षावादी
होना। और इन सब का परिणाम तनाव,
ब्लड-प्रेशर,
घबराहट,
बेचैनी
,रिश्तो
में तनाव और तनाव को कम करने
या भूलाने का एक --भूलने
का एक मात्र
उपाय आमोद-प्रमोद
,
हिल
स्टेशन की सैर। अब ऐसे में
धर्म को एक अछि खासी commodity
बनाने
वाला वो तबका जो स्वयम को धर्म
का मसीहा दिखा कर बसे और ट्रेने
तीर्थ यात्रा कम्पनी के नाम
पर लोगो को लुभावने आकर्षण
दे दे कर उकसाते है। और नीम
हकीम खतरा ये जान ,
धर्म
और धार्मिकता के मर्म को पूरी
तरह समझे बगैर बोरिया बिस्तर
ले चल देते है हिल स्टेशन के
सैर सपाटे cum
तीर्थ
यात्रा के ठेकेदारों के पास।
खुश होते है प्रति नग खर्च
कम में दस से पन्द्राह दिन के
हनीमून पर। या फिर खुद की कार
से लॉन्ग ड्राइव कम रोमान्स
राइड पर। रास्ते में पीना
पिलाना आम बात .....
ये
यात्रा धार्मिक नहीं रह जाती
....
ये
...
ना
मालूम क्या ही हो जाती है
........
मुझे
जहां तक मालूम है हिन्दू धर्म
ग्रंथो में मनुष्य जीवन को १
० ० वर्ष का मान उसे उम्र के
अनुसार आश्रमों में बांटा
गया है ताकि इंसान व्यवस्थित
और दीर्घायु के साथ साथ सुखी
संपन्न जीवन यापन कर सके ...
ये
आश्रमों में एक है ...
संन्यास
आश्रम जो की आयु का वो होता
है इंसान अपने सभी उत्तरदायित्वो
से हो जाता है और स्वयम
को इश-अराधना,
ध्यान
और साधना में लगा आध्यात्मिक
सुख प्राप्त करता है
और
इसी क्रम में वह तीर्थ यात्राएं
करता है ,
क्रोध
,
लोभ
,
मोह
के जंजाल से जीवात्मा को मुक्त
कर ,
परमात्मा
के सानिध्य को पाने के उपक्रम
में वो दिन रात सारे मोह ताज
कर तीर्थो पर जाता है। परन्तु
आज हम देख रहे है २ साल का बच्चा
भी तीर्थ यात्रा गया था ....
तो
...
१
६ साल की बालिका भी तीर्थ कर
रही है,.......
हाँ
मजेदार बात ये है की बुजुर्गो
की संख्या उतनी नहीं जितनी
प्रोढ़ लोगो की है ....
इस
सब में धार्मिकता कम,
अधार्मिकता
अधिक दिखती है,
अंधविश्वास
और अज्ञान अधिक दिखता है ,
अन्धानुकरण
साफ़ द्रष्टिगोचर होता है ,
हम
समझ सकते है,
किस
मकसद से किस उम्र का इंसान ऐसी
आस्था और विश्वास वाले स्थानों
पर जाते है और वहाँ के प्राकृतिक
सौहाद्र और वातावरण को नुक्सान
भी पहुंचाते है।
.
धर्म
शास्त्रों में शिव का स्थान
सबसे ऊपर है वो त्रिनेत्रधरी
है,
वो
त्रिलोकी है वो अन्तर्यामी
है ,
वो
भोले है,
लेकिन
हम ये क्यों नहीं स्वीकारते
वो एकांतवासी है ,
वो
साधक है,
उनकी
साधना में तो स्वयं पार्वती
(प्रकृति)
भी
बाधा उत्पन्न नहीं कर सकती
थी और करती थी तो अच्छा ख़ासा
दंड भुगतना पड़ता था ,
तांडव
से धरती डोल उठती है ,
तीनो
लोक काँप उठते है। और इंसान
अपनी हदें भूल उनके एकांत
को कोलाहल में परिवर्तित करता
चला जा रहा है,
...... कोई
सीमा ही नहीं रही ,
कोई
बंधन ही नहीं रहे ,
कोई
अंकुश ही नहीं .....
धन
के दम पर क्या क्या खरीद लेना
चाहता है ...
चाह
परिणाम सामने है
...
उन्होंने
बदरीनाथ के प्राचीन स्वरुप
को एक बार वापस हमारे सम्मुख
ला रखा है ,
केदारनाथ
के मंदिर में बाबा भू-समाधि
में है और बाकी बचा है तो एक
नंदी,
........ और
सब और वीरान ....
सन्नाटा
..........
क्यों
नहीं हम सीख लेते इस हादसे से
....
हमें
प्रण लेना होगा ......
१.
तीर्थ
यात्रा अपने सभी उत्तरदायित्वो
से मुक्त हो कर ही जाना है।
२.
६५
/
७
० वर्ष अपना के व्यक्ति को स्वास्थ्य जांच करवा कर ही जाने दिया जाए
( 65 /70 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को किसी विशेष परिस्थिति में ही ऐसी जगहों पर जाने दिया
जाए )
३ . धार्मिकता अपनाये ... मन, कर्म , और वचन से अन्धविश्वासो में नहीं।
( 65 /70 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को किसी विशेष परिस्थिति में ही ऐसी जगहों पर जाने दिया
जाए )
३ . धार्मिकता अपनाये ... मन, कर्म , और वचन से अन्धविश्वासो में नहीं।
४.
सरकार
इन स्थानों पर व्यावसायिकता
को बैन करे।
५
दर्शन करने के बाद,
वहां
रुकने के लिए सिर्फ कुछ घंटो
की इजाजत दे
६.
नियंत्रित
यत यात व्यवस्था को अपनाये।
७
बीमा कम्पनियों को दायित्व
दे।
8. स्थानीय प्रशासन तीर्थ-स्थलों को पर्यटन या पिकनिक स्पोट न बनने दे
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई ... ईन्सान ..
कितना
बदल गया भगवान् .......
मेरी
इस पोस्ट से किसी की धार्मिक
भावना को ठेस पहुंची हो तो
मुझे अनजान समझ कर माफ़ करें।
kafhi kuch hamaarey bhavo ko shabt diya uskey liya thanks.prakarti se maanav khilwad kar raha hai wo bakshey gi nahi mager desh k neta bharat ko barbaad karney per tuley hai.jis tehrah militry sena jan ki seva kar rahi hai us se lagta hai desh ki saari partiyo k neta or dharam ko khilona banaker jaanta ko gumrah kerney wale kadmula ,pandito,dhongi sadhu ko desh ki unchi choti per bhej dena chaiye or seena ko desh sambla dena chaiye mager usmese se raksha sodey k dalal ki pahchan kar lena chaiye.badaa gusa aata hai jab desh k neta television per ek duserey ko nochete hai or media majey le le kar commercial se paisa kamata hai.
जवाब देंहटाएंThanks for appreciation. it is really pathetic there.
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