हर तरफ हा हा कार है,
प्रकृति ने दिखाया ऐसा रूप है
वासना के सुख की खातिर
इंसान ने गंवाया सुख-चैन है
एक बार नहीं कई सौ बार दोहराया है
ना मालूम क्यों इंसान के समझ ना आया है
माँ, बहन, बेटी हो या हो अर्धांगिनी
है नारी जीवन पथ की संगिनी
तक था भ्रम तुम्हे तारण-हार होने का
गंगा सर पर धारण हार होने का
शिव होने का, शास्वत होने का
गर्व सब धूमिल सा हुआ सर्वशक्तिमान होने का
न समझाओ मुझे की वो तो मिटटी की थी
अस्सी साल की बूढी थी, ..... तो क्या
ये हाड मॉस का पुतला पञ्च तत्व का नहीं
तो क्या ये मिटटी ना होगा, तो क्या ...
.... तो धारित गंगा क्या अपना रोद्र
रूप न दिखाएगी ............. सीख लो पूरब वालो
एक दिन ये गंगा जड़-शास्वत को भी बहा ले जाएगी।

Bahut Sunder Anita Jee... Aur Bahut acchi Seekh
जवाब देंहटाएंThanks Om Prakashji for time shared to this post and a nice comment.
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