'' भारतीय संस्कृति में मृत्यु के समय तो दुश्मन भी आ जाता है
... जन्मदिन मनाने .. नानी के घर नहीं चला जाता " .
.. विपत्ति के पल और उनका रुख-ए-मिजाज ...
आपके तिलिस्मई वादों का .....
जिंदगियां सम्हलती नहीं
लेकर सहारा रेत के दरकते किनारों का
आजकल कूचा-ए-सियासत में
है आना-ओ-जाना माना आपका
इन्तिज़ार करती है टूटती साँसे
किसी रहनुमा के आने का, हो सके गर
ज़रा महसूस करके देखिये दर्द उस बदनसीब का
लाशो से कफ़न उतार कर जो ढक रहा
तन अपने अजीज का,
था हर तरफ सैलाब-बे-आब आसमां का
एक एक बूँद को रहा तरस हलक हर एक का
सदियाँ करेंगी गम लाशो के खो जाने का
और अनसुनी कर आपके यूँ ही
महफ़िलये-कब्रिस्तान छोड़ जाने का
आप ही कहिये अब और कितना यकीं करें शेख जी
आपके तिलिस्मई वादों का .....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें