सोमवार, 3 जून 2013

क्या क्या न बिक गया तेरे शहर में देख


क्या क्या न बिक गया तेरे शहर में देख 



क्या क्या न बिक गया तेरे शहर में देख 
रिश्ते-नाते, चोली, दामन , पगड़ी तक बिक गयी 

बिकते बिकते दहलीज की मासूम इज्जत बिक गयी 
रोटी, कपडा, मकान कमाते कमाते ये देखो 

कारे खरीदने को बहन, बेटियाँ बिक गयी 
कल जब जाएगा घर का आदमी बाजार

गेहूँ के बोरे में लाएगा लाशें बहन-बेटियों की जार जार 
छप्पर की छाँव कम न थी फिर क्यों इज्जत 
सरे बाज़ार बिक गई .............

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